रतलाम की स्वाद के लिए मशहूर बालम ककड़ी और गराडू को जीआई टैग मिल गया है। गराडू को मालवी गराडू के नाम से मान्यता मिली। …और पढ़ें

HighLights
- इससे पहले रियावन लहसुन और रतलामी सेंव को भी जीआई टैग मिल चुका है
- रतलाम में 100 हेक्टेयर में बालम ककड़ी और 120 हेक्टेयर में गराडू का उत्पादन होता है
- केसरिया बालम ककड़ी रसीले स्वाद और पीले-हरे-केसरिया रंग के लिए है मशहूर
नईदुनिया प्रतिनिधि, रतलाम। स्वाद के लिए प्रसिद्ध बालम ककड़ी और रतलामी गराडू को अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान मिल गई है। इन दोनों उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ है। गराडू को मालवी गराडू के नाम से यह मान्यता मिली है। इससे पहले जिले की प्रसिद्ध रियावन लहसुन और रतलामी सेंव को भी जीआई टैग मिल चुका है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रदेश के सभी जिलों में स्थानीय स्तर पर विशिष्ट उत्पादों को चिह्नित कर उन्हें जीआई टैग दिलाने की दिशा में पहल करने के निर्देश दिए गए थे। इसी क्रम में एमएसएमई मंत्री चेतन्य काश्यप के विशेष प्रयासों के चलते परिणाम अब सामने आया है।
220 हेक्टेयर क्षेत्र में होता है उत्पादन
वर्तमान में रतलाम जिले में लगभग 100 हेक्टेयर क्षेत्र में बालम ककड़ी और करीब 120 हेक्टेयर क्षेत्र में गराडू का उत्पादन किया जा रहा है। इन दोनों फसलों से बड़ी संख्या में किसान जुड़े हुए हैं। जीआइ टैग मिलने के बाद इनके उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि और किसानों की आय बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
स्वाद और गुणवत्ता ने दिलाई अलग पहचान
सैलाना क्षेत्र की केसरिया बालम ककड़ी अपने रसीले स्वाद और पीले, हरे तथा केसरिया रंगों की विशिष्टता के कारण देशभर में पहचान रखती है। वहीं रतलाम का गराडू अपने अनोखे स्वाद, अंदर से मुलायम और बाहर से कुरकुरा बनने की विशेषता के कारण खास माना जाता है। यह विटामिन, खनिज और फाइबर का अच्छा स्रोत भी है।
इसमें मौजूद एंटीआक्सीडेंट तत्व स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। यह रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में भी सहायक माना जाता है। शीत ऋतु में गराड़ू की फसल बाजार में आती है। खास तौर पर नवंबर से फरवरी तक इसकी उपलब्धता व मांग बनी रहती है। बालम ककड़ी की सर्वाधिक आवक वर्षाकाल के दौरान होती है।
किसानों को मिलेगा बेहतर बाजार
जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनकी मांग बढ़ने की संभावना है। इससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा और निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे। रतलाम की विशिष्ट जलवायु, उपजाऊ मिट्टी और पारंपरिक खेती पद्धतियों ने इन उत्पादों को खास पहचान दिलाई है, जिसे अब आधिकारिक मान्यता भी मिल गई है।
उपसंचालक उद्यानिकी मंगलसिंह डोडवे के अनुसार यह उपलब्धि जिले के किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, उद्यानिकी विभाग और जिला प्रशासन के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
