नईदुनिया प्रतिनिधि, रायसेन। संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं को सहेजने की जगह नहीं होते, बल्कि वे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की जीवंत कहानियां भी सुनाते हैं। विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर बात उस ऐतिहासिक धरोहर की, जहां पत्थरों में भी बुद्ध का संदेश महसूस होता है।
रायसेन जिले के विश्व प्रसिद्ध सांची संग्रहालय में रखी मूर्तियां, स्तंभ और अवशेष मानो आज भी इतिहास को जीवंत कर देते हैं। यहां अशोक का सिंह स्तंभ शौर्य की कहानी कहता है, शुंगकालीन यक्षिणी की प्रतिमा कला की सुंदरता दिखाती है और गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमा शांति और ध्यान का संदेश देती नजर आती है।
दो हजार साल के इतिहास की धरोहर
करीब दो हजार वर्ष पुरानी यह धरोहर देश ही नहीं, विदेशों से आने वाले पर्यटकों, शोधार्थियों और बौद्ध भिक्षुओं को भी आकर्षित करती है। श्रीलंका, थाईलैंड, जापान और म्यांमार से हर साल बड़ी संख्या में बौद्ध अनुयायी यहां पहुंचते हैं।
वहीं हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों के छात्र भी यहां शुंग और गुप्तकालीन कला पर अध्ययन करने आते हैं।
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1919 में हुआ था संग्रहालय का निर्माण
सांची में उत्खनन के दौरान मिली ऐतिहासिक वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए वर्ष 1919 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने पहाड़ी की चोटी पर एक छोटा संग्रहालय बनवाया था।
बाद में जगह कम पड़ने और बेहतर प्रदर्शन व्यवस्था की जरूरत को देखते हुए वर्ष 1966 में इसे सांची स्तूप के नीचे स्थित वर्तमान भवन में स्थानांतरित किया गया। संग्रहालय में अधिकांश अवशेष सांची क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं, जबकि कुछ मूर्तियां विदिशा और गुलगांव क्षेत्र से लाई गई हैं।
अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष सबसे बड़ा आकर्षण
संग्रहालय की सबसे खास धरोहर अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष है, जिसने भारत के राष्ट्रीय प्रतीक को प्रेरित किया। चार दिशाओं में मुख किए बैठे शेर शक्ति, संतुलन और बौद्ध दर्शन का प्रतीक माने जाते हैं।
इसके अलावा यहां शुंगकालीन नागराज मूर्तियां, यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाएं, सातवाहन काल के तोरण अवशेष और गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमाएं भी आकर्षण का केंद्र हैं।
चार गैलरियों में सजा 2000 साल का इतिहास
सांची संग्रहालय की चार प्रमुख गैलरियों में अलग-अलग कालखंडों की दुर्लभ धरोहरें सुरक्षित रखी गई हैं-
– मौर्य और शुंग काल की यक्ष-यक्षिणी एवं सालभंजिका प्रतिमाएं
– सातवाहन और कुषाण काल के तोरण अवशेष व प्रारंभिक बुद्ध प्रतिमाएं
– गुप्तकालीन पद्मपाणि बोधिसत्व और ध्यानमग्न बुद्ध प्रतिमाएं
– परमार काल की खंडित मूर्तियां और मध्यकालीन अवशेष
सांची संग्रहालय केवल इतिहास देखने की जगह नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और बौद्ध दर्शन को महसूस करने का एक अनोखा अनुभव है।

