भूपेंद्र सिंह राजपूत, नईदुनिया, भोपाल। भोपाल की आब-ओ-हवा में कुछ ऐसा जादू है कि यहाँ की मिट्टी से उठने वाले किरदार वक्त की बंदिशों को तोड़कर अमर हो जाते हैं। कुछ किस्से इतिहास की सुनहरी किताबों में दफन हो जाते हैं, तो कुछ पुरानी बैठकों के पानदान और चाय की चुस्कियों में जिंदा रहते हैं।
ऐसा ही एक नाम है- “सूरमा भोपाली”।
लेकिन ठहरिए! अपनी आंखों के सामने से फौरन ‘शोले’ फिल्म के जगदीप, उनकी वो कटीली मूंछें और लकड़ी के डंडे का चश्मा हटा दीजिए। क्योंकि वो तो सिर्फ ढाई घंटे का एक फिल्मी चश्मा था। आज हम आपको मिला रहे हैं भोपाल के उस असली ‘सूरमा भोपाली’ से, जिसके नाम का सिक्का कभी भोपाल की कड़कती धूप और सर्द रातों में चलता था।
एक ऐसा शख्स जो मिजाज से लोहे जैसा सख्त था, लेकिन दिल से मोम जैसा नरम। नाम था- नाहर सिंह बघेल…
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फोटो- राजधानी में सदर मंजिल और नाहर सिंह बघेल।
नवाबी दौर का भोपाल और बदलता वक्त
यह उस दौर की बात है जब भोपाल की गलियों में नवाबी रवायतों का इत्र महकता था। साल 1960 में भोपाल रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खान का इंतकाल हुआ। उनके बाद साजिदा सुल्तान ने भोपाल की नवाब बेगम के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इस शाही परिवार का अपना अलग ही रुतबा था।
लेकिन इतिहास करवट ले रहा था। दिसंबर 1971 में भारत सरकार ने 26वें संविधान संशोधन के जरिए प्रिवी पर्स और राजाओं-नवाबों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए। कागजों पर नवाबी दौर का अंत हो गया, लेकिन भोपाल के लोगों के दिलों में साजिदा बेगम के लिए सम्मान बना रहा। 1995 में उनके निधन तक यह रिश्ता कायम रहा।
इसी बदलते इतिहास के बीच, रीवा के एक रसूखदार राजपूत परिवार से ताल्लुक रहने वाले चिमन सिंह भोपाल आ चुके थे। वे नवाब साहब के निजी सहायक (PA) और बेहद भरोसेमंद सलाहकारों में गिने जाते थे। चिमन सिंह की बेटी लक्ष्मी बाई की शादी बिजली विभाग में ईई पद पर कार्यरत कैलाश सिंह बघेल से हुई। शुरुआती दिनों में यह परिवार भोपाल के रेत घाट इलाके के पास एक कच्चे मकान में रहता था।
कैलाश सिंह और लक्ष्मी बाई के तीन बेटे हुए- नाहर सिंह, सरदार सिंह और दरबार सिंह। इनमें सबसे बड़े बेटे नाहर सिंह का जन्म 1933 में हुआ।
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फोटो- नवाबी दौर में सदर मंजिल का दृश्य। (फाइल फोटो)
नवाब की राजपूत बहन और ‘शाही रिश्ता’
नाहर सिंह बघेल के भीतर जो गंगा-जमुनी तहज़ीब कूट-कूट कर भरी थी, उसकी जड़ें उनके पारिवारिक संस्कारों में थीं। नाहर सिंह की भतीजी प्रो. मंजू सिंह एक ऐसा ऐतिहासिक राज़ खोलती हैं, जो दिल को छू लेता है।
नाहर सिंह की मां लक्ष्मी बाई बघेल, भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान को राखी बांधती थीं। उस नवाबी दौर में नवाब साहब अपनी इस मुंहबोली राजपूत बहन का बेहद सम्मान करते थे और हर राखी पर उन्हें महंगे तोहफे भेंट किया करते थे। यह रिश्ता सिर्फ दिखावे का नहीं, बल्कि रूह का था।
मौत के बाद भी कायम रही वफ़ा
जब नवाब साहब का इंतकाल हुआ, तो उनकी पत्नी और भोपाल की नवाब बेगम साजिदा सुल्तान ने इस रिश्ते को टूटने नहीं दिया। उन्होंने नवाब साहब की बहन ‘लक्ष्मी बाई’ से ताल्लुक़ कायम रखा और उनसे राखी बंधवाती रहीं।
नवाब की आखिरी ख्वाहिश
नवाब साहब ने जीते-जी अपनी राजपूत बहन के लिए 50 रुपये महीना (जो उस दौर में एक बड़ी रकम हुआ करती थी) देने का शाही फरमान जारी किया था। नवाब साहब के दुनिया से जाने के बाद भी बेगम साजिदा ने इस आखिरी ख्वाहिश का सम्मान किया और लक्ष्मी बाई बघेल को जीवनभर यह राशि ससम्मान मिलती रही।
क्योंकि उस समय लक्ष्मी बाई के पिता चिमन सिंह की तनख्वाह 140 रुपये हुआ करती थी। इससे नवाब परिवार और चिमन सिंह के पारिवारिक ताल्लुक आसानी से समझे जा सकते हैं।
यही वजह थी कि जब भी भोपाल में किसी दोस्त पर मुसीबत आती या किसी से मुकाबला करने की बात होती, तो नवाबी रुतबे और राजपूती आन की मर्यादा वाली मां का बेटा ‘नाहर सिंह’ अपनी जान की बाजी लगाने सबसे आगे कूद पड़ता था।
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नाम कैसे पड़ा “सूरमा भोपाली”?
नाहर सिंह को यह नाम किसी सरकार ने तमगे के रूप में नहीं दिया था, और न ही यह कोई मजाक था। भोपाल में ‘सूरमा’ उसे कहा जाता है जो अपनी बात का धनी हो, जो किसी के आगे झुके नहीं, और जो यारों का यार हो।
पुराने भोपाली बताते हैं कि नाहर सिंह जब किसी महफिल में कदम रखते, तो लोग अदब से खड़े हो जाते। कड़क इस्त्री किए हुए कपड़े, चमचमाते उम्दा जूते, और महंगे खुशबूदार परफ्यूम की ऐसी लपट उठती कि लोग महक जाते थे। जहाँ वे बैठ जाते, वहाँ महफिल जम जाती। उनके इसी रौब, दमकते व्यक्तित्व और जिंदादिली को देखकर भोपाल की अवाम ने उन्हें नाम दिया- ‘सूरमा भोपाली’।
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रौबदार शख्सियत, लेकिन दिल गरीबों के लिए धड़कता था
नाहर सिंह की कद-काठी सामान्य थी, लेकिन उनका व्यक्तित्व असाधारण था। उनकी नाक पर हमेशा गुस्सा रहता था। वे अपने उसूलों, राजपूती मर्यादा और कायदे-कानून के बेहद पक्के माने जाते थे। गलत बात उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी।
लेकिन उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू इससे बिल्कुल अलग था। वे भोपाल म्युनिसिपल्टी (नगर निगम) की सदर मंजिल में नाकेदार के पद पर कार्यरत थे। ड्यूटी के दौरान या रास्ते में कोई जरूरतमंद मिल जाए तो वे बिना पूछे मदद कर देते। जेब में पैसे हों तो पैसे दे देते, पैसे न हों तो घर से सामान भिजवा देते। कई लोगों के लिए वे जरूरत के समय सहारा बनते थे।
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‘काले मामा’ और रज़ा मुराद का अनसुना रिश्ता
नाहर सिंह की जिंदगी का सबसे फिल्मी पन्ना बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ‘रज़ा मुराद’ से जुड़ा है। यह उस दौर की बात है जब रज़ा मुराद मुफ़लिसी और संघर्ष के दिनों में भोपाल में थे। तब नाहर सिंह उनके लिए ढाल बनकर खड़े हुए। उन्होंने ही रज़ा मुराद को आकाशवाणी (रेडियो) में काम दिलाने में मदद की, जहां से उनकी दमदार आवाज को पहचान मिली।
बाद में जब रज़ा मुराद मुंबई के बड़े स्टार बन गए, तब भी इस भोपाली सूरमा का रुतबा कम नहीं हुआ। नाहर सिंह साल में कई बार मुंबई जाते और महीनों रज़ा मुराद के घर मेहमान बनकर रहते। इस चक्कर में नगर निगम की नौकरी से उन्हें कई बार सस्पेंशन के नोटिस भी मिले, पर सूरमा को नौकरी की परवाह कहां थी! वे मस्तमौला थे।
रज़ा मुराद उन्हें प्यार से ‘काले मामा’ कहते थे और उनकी बहन सबीहा नाहर सिंह को राखी बांधती थीं। जब रज़ा मुराद की बेटी (अभिनेत्री सोनम) की शादी भोपाल में तय हुई, तो कपड़े खरीदने से लेकर बारात के स्वागत तक, नाहर सिंह ही सबसे आगे खड़े थे।
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जब फिल्म ‘शोले’ पर भड़क गए असली सूरमा
साल 1975 में जब रुपहले पर्दे पर ‘शोले’ रिलीज हुई, तो पूरे देश में ‘सूरमा भोपाली’ (अभिनेता जगदीप) का किरदार सुपरहिट हो गया। लोग थिएटर में तालियां बजा रहे थे, लेकिन भोपाल की प्रोफेसर कॉलोनी के एक घर में गुस्सा उबल रहा था।
नाहर सिंह बघेल भड़क गए। उन्हें लगा कि जिस ‘सूरमा भोपाली’ नाम को पूरे भोपाल में इज्जत, कड़क मिजाज और दरियादिली के लिए जाना जाता है, फिल्मों में उसे एक डपोरशंख, मजाकिया और चालाक इंसान के रूप में क्यों दिखाया गया? यह उनके आत्मसम्मान पर चोट थी।
उन्होंने आव देखा न ताव, सीधे फिल्म के लेखक ‘जावेद अख्तर’ पर मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। बंबई से लेकर भोपाल तक हड़कंप मच गया। नाहर सिंह को मनाना लोहे के चने चबाने जैसा था। आखिर में उनके सबसे छोटे भाई दरबार सिंह ने उनके हाथ जोड़े, उन्हें समझाया कि यह सिर्फ एक काल्पनिक किरदार है। नाहर सिंह अपने छोटे भाई की बात कभी नहीं टालते थे, इसलिए उन्होंने भारी मन से वो मुकदमा वापस ले लिया।
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फोटो- नाहर सिंह की भतीजी अर्चना सिंह और मंजू सिंह ।
प्रोफेसर कॉलोनी का नया घर और ‘लकी चार्म’ अर्चना
भोपाल रियासत के विलय के बाद प्रशासन ने परिवार को रेत घाट से स्थानांतरित कर प्रोफेसर कॉलोनी में मकान आवंटित किया। यह वर्ष 1972 की बात है।
संयोग देखिए, जब यह परिवार इस नए पुश्तैनी घर में शिफ्ट हुआ, ठीक उसी समय उनके सबसे छोटे भाई दरबार सिंह के घर एक छोटी सी किलकारी गूंजी- उनकी छोटी बेटी ‘अर्चना’ का जन्म हुआ। अर्चना बताती हैं कि नाहर सिंह ‘बाबा’ उन्हें परिवार के लिए बेहद ‘लकी चार्म’ मानते थे। उन्हें लगता था कि अर्चना के आने के साथ ही इस नए घर में खुशियाँ और बरकत आई हैं।
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13 नवंबर 1979: जब रूखसत हुए सूरमा
वक्त अपनी रफ्तार से गुजर रहा था। नाहर सिंह की अपनी कोई संतान नहीं थी, लेकिन अपने भाइयों (सरदार सिंह और दरबार सिंह) के बच्चों को वे अपनी जान से ज्यादा चाहते थे। बच्चे उन्हें ‘बाबा’ कहते थे और यह संबोधन सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक था।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 13 नवंबर 1979 का वो काला दिन आया। एक दर्दनाक सड़क हादसे ने भोपाल के इस सबसे रोबीले, सबसे रंगीन और सबसे दिलदार इंसान को हमेशा के लिए छीन लिया। नाहर सिंह सिर्फ 46 वर्ष के थे जब उन्होंने आखिरी सांस ली। उस दिन सिर्फ एक परिवार ने अपना ‘बाबा’ नहीं खोया था, पूरे भोपाल ने अपना ‘सूरमा’ खो दिया था।
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फोटो- प्रोफसर कॉलाेनी में नाहर सिंह के घर को मंजू सिंह ही संभाल रही हैं।
पुश्तैनी विरासत जो आज भी जिंदा है…
समय बीतता गया। नाहर सिंह के दोनों भाई सरदार सिंह और दरबार सिंह भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उस पीढ़ी की यादों को संजोए रखने वालों में आज सबसे वरिष्ठ कड़ी मालती बघेल हैं, जो परिवार की बुजुर्ग और आदरणीय सदस्य हैं।
आज नाहर सिंह (बाबा) की पुश्तैनी जायदाद और प्रोफेसर कॉलोनी के इस ऐतिहासिक घर की पूरी जिम्मेदारी उनके छोटे भाई दरबार सिंह की बड़ी बेटी ‘डॉ. मंजू सिंह’ के कंधों पर है। डॉ. मंजू सिंह वर्तमान में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) में केमिस्ट्री की प्रोफेसर हैं और अपने पति अजय सिंह के साथ इसी ऐतिहासिक घर को सहेजे हुए हैं। उनकी बेटी नैरिती अब अमेरिका में सेटल हो चुकी हैं।
मंजू सिंह जब अपने बाबा को याद करती हैं, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं-
“बाबा बेहद तेज-तर्रार और अपनी बात के पक्के थे। अपनों के लिए वे किसी से भी भिड़ जाते थे। गंगा-जमुनी तहजीब के वे सच्चे पैरोकार थे और खाने-खिलाने का उन्हें बेइंतहा शौक था। आज भले ही वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन इस घर की हवा में और इसके चप्पे-चप्पे में बाबा की मौजूदगी का अहसास आज भी होता है।”
मसखरा नहीं रौबदार था सूरमा
दुनिया जिसे ‘सूरमा भोपाली’ समझकर हंसती है, वो तो महज तीन घंटे के सिनेमा का एक ढांचा था। लेकिन भोपाल की यादों के पन्नों में जो सूरमा दर्ज है, वो कभी झुका नहीं। वो राजा नहीं था, लेकिन उसका रुतबा किसी शहंशाह से कम नहीं था। वो इतिहास की किताबों में भले न हो, लेकिन जिसने भी उसे जाना, उसके दिल में वो आज भी ‘अमर’ है।

