राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण का विवाद 24 साल बाद भी सुलझ नहीं पाया है। वर्ष 2002 में एससी-एसटी वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बनाए गए नियमों से शुरू हुआ विवाद नए पदोन्नति नियम-2025 तक पहुंच जरूर गया है लेकिन यह भी कोर्ट के निर्णय के अधीन है।
इस दौरान अनारक्षित (सामान्य) वर्ग के कर्मचारियों ने कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। वर्ष 2016 में जबलपुर हाई कोर्ट से उसे बड़ी जीत भी मिली लेकिन इस फैसले का व्यावहारिक लाभ नहीं मिल सका। यही कारण है कि 14 साल के संघर्ष में अनारक्षित वर्ग के खाते में एक ही बड़ी कानूनी उपलब्धि है, जबकि अधिकारों की लड़ाई अब भी जारी है।
वर्ष 2016 में हाई कोर्ट ने निरस्त किए थे वर्ष 2002 के नियम
मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम-2002 के तहत आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिलने से वरिष्ठता को लेकर विवाद खड़ा हुआ। अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों का तर्क था कि कई मामलों में उनसे कनिष्ठ कर्मचारी आरक्षण के आधार पर पदोन्नत होकर उनसे ऊपर पहुंच गए। मामला जबलपुर हाई कोर्ट पहुंचा।
वर्ष 2016 में हाई कोर्ट ने 2002 के पदोन्नति नियमों को अवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने इन नियमों के आधार पर पदोन्नत कर्मचारियों को पदावनत करने के निर्देश भी दिए। यह निर्णय अनारक्षित वर्ग के लिए बड़ी उम्मीद लेकर आया था। माना जा रहा था कि सरकार नियमों में सुधार करेगी और पदोन्नति में वरिष्ठता एवं समान अवसर का संतुलन बहाल होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। शीर्ष अदालत ने मामले में यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि 2002 के नियमों के आधार पर पदोन्नत किसी कर्मचारी को पदावनत नहीं किया गया।
पुराने लाभार्थियों को नए नियमों में फिर पदोन्नति
विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि पुराने नियम निरस्त होने के बावजूद उनसे पदोन्नत कर्मचारियों की स्थिति बनी रही। इसके बाद सरकार ने पदोन्नति के लिए नए नियम बनाए। वर्ष 2025 में लागू किए गए नए नियमों को भी अनारक्षित वर्ग के संगठनों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है। प्रकरण फिलहाल लंबित है।
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उधर, नए नियम से 70 हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारी पदोन्नत हो चुके हैं। अनारक्षित वर्ग का प्रश्न है कि जब पुराने नियमों से मिली पदोन्नति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में यथास्थिति का आदेश था, तो उन्हीं कर्मचारियों को नए नियमों के तहत दोबारा पदोन्नति का लाभ कैसे मिला। इससे उच्च पदों पर पहले से बनी असमानता बनी रही।
वर्ष 2002 में शुरू हुआ भेदभाव 24 साल बाद भी जारी है। सरकार ने आरक्षित वर्ग के पक्ष में न्यायालय में पैरवी के लिए करोड़ों रुपये राजकोष से खर्च किए, जबकि अनारक्षित वर्ग को अपने अधिकारों के लिए स्वयं संघर्ष करना पड़ा। यह लड़ाई भविष्य में कर्मचारियों के सेवा अवसर और वरिष्ठता की भी है। – केपीएस तोमर, अध्यक्ष, सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संस्था (सपाक्स)
सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर, आरक्षण का उपवर्गीकरण और दक्षता परीक्षण सहित अन्य विषयों पर समय-समय पर निर्णय सुनाए हैं। इनका समावेश भर्ती और पदोन्नति नियमों में होना चाहिए। यदि आरक्षित वर्ग का कोई कर्मचारी अनारक्षित पद पर चयनित होता है तो आगे उसकी स्थिति अनारक्षित ही रहनी चाहिए। -सुधीर नायक, अध्यक्ष, मंत्रालय अधिकारी-कर्मचारी संघ
