लोक निर्माण विभाग ने अब नई व्यवस्था बनाई है। इसमें सड़क और पुल निर्माण की लागत स्थल परीक्षण के बाद ही बढ़ाई जाएगी। इसके लिए मुख्य अभियंता और अधीक्षण य …और पढ़ें

HighLights
- निर्माण कार्यों में बजट गड़बड़ी पर लगाम
- PWD ने गठित कीं दो स्तरीय समितियां
- लागत वृद्धि के लिए देना होगा प्रमाण पत्र
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने अब नई व्यवस्था बनाई है। इसमें सड़क और पुल निर्माण की लागत स्थल परीक्षण के बाद ही बढ़ाई जाएगी। इसके लिए मुख्य अभियंता और अधीक्षण यंत्री की अध्यक्षता में समिति बनाई जाएगी। यह प्रमाण पत्र देगी और इसके आधार पर ही वित्तीय समिति में प्रस्ताव रखे जाएंगे।
डीपीआर और बजट प्रबंधन की चुनौतियां
दरअसल, प्रदेश में निर्माण कार्यों की लागत के जो प्रस्ताव स्वीकृत होते हैं, आमतौर पर उसमें वृद्धि होती ही है। विभाग पुनरीक्षित लागत के प्रस्ताव देते हैं, जिसे वित्तीय समिति में अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। लागत वृद्धि के इन प्रस्तावों के कारण विभागों का बजट प्रबंधन तो गड़बड़ाता ही है, विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) पर प्रश्न खड़े होते हैं। विधानसभा के विभिन्न सत्रों में लागत वृद्धि को लेकर कई सवाल पूछे जा चुके हैं।
नई समितियों का गठन
प्रदेश में इस समय लगभग 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत के सड़क व पुलों के काम चल रहे हैं। वित्तीय स्वीकृति डीपीआर के आधार पर होती है। इसके बाद भी लगभग सभी परियोजनाओं में लागत वृद्धि के प्रस्ताव विभाग को मिलते हैं। इसे लेकर सवाल भी उठते हैं। अब पीडब्ल्यूडी ने इसे देखते हुए दो स्तर पर समिति बनाने का निर्णय लिया है।
लागत के आधार पर समितियों का कार्य विभाजन
पांच करोड़ रुपये से अधिक के काम में यदि लागत वृद्धि का प्रस्ताव मिलता है तो उसका स्थल निरीक्षण संबंधित क्षेत्र के मुख्य अभियंता की समिति करेगी। इसमें संबंधित अधीक्षण यंत्री और कार्यपालन यंत्री रहेंगे। इसी तरह से पांच करोड़ रुपये से कम लागत वाले कामों के लिए अधीक्षण यंत्री की अध्यक्षता में समिति रहेगी। इनका काम लागत वृद्धि के आधार पर पड़ताल कर रिपोर्ट देना होगा। इसके साथ एक प्रमाण पत्र भी दिया जाएगा। इसके आधार पर ही वित्तीय समिति के सामने प्रस्ताव रखे जाएंगे।
जल जीवन मिशन का उदाहरण और वित्तीय सबक
बता दें, जल जीवन मिशन में पुनरीक्षित लागत के कारण राज्य सरकार पर पौने तीन हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार आ गया। दरअसल, साढ़े आठ हजार परियोजनाओं को कुछ गांव छूट जाने के कारण पुनरीक्षित किया गया। इससे लागत बढ़ गई। केंद्र सरकार से जब यह मांगी गई तो उसने देने से मना कर दिया क्योंकि गलती राज्य की थी।
चूंकि, योजनाओं पर काम प्रारंभ हो गया था इसलिए सरकार ने अपने बजट से व्यवस्था तो कर दी लेकिन वित्तीय प्रबंधन गड़बड़ा गया। योजना की अवधि 2028 तक बढ़ा दी गई है, इसलिए प्रयास किया जा रहा है कि बढ़ी हुई लागत की भरपाई केंद्र सरकार कर दे।
