चंद्रप्रकाश शर्मा, नईदुनिया, देवास। यह कहानी उस पहाड़ी की है, जिसकी छाती कभी खनन मशीनों ने छलनी कर दी थी। जहां न पानी था, न हरियाली और न ही जीवन के कोई स्पष्ट संकेत। जिम्मेदारों की अनदेखी के बीच जब इसे पर्यटन गतिविधियों के लिए सौंपने की योजना बनी तो प्रकृति प्रेमी आगे आए।
कानूनी लड़ाई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंची और फिर शुरू हुई उस पहाड़ी के पुनर्जीवन की कहानी, जो आज देश के लिए पर्यावरण पुनर्वास का उदाहरण बन रही है। यह दास्तान देवास बायपास स्थित शंकरगढ़ पहाड़ी की है।
करीब दस वर्ष पहले तक बंजर दिखने वाली इस पहाड़ी पर आज तीन लाख से अधिक पौधे लहलहा रहे हैं। जैव विविधता लौट रही है और तेंदुआ, लकड़बग्घा तथा जंगली बिल्ली जैसे वन्यजीव भी यहां देखे गए हैं। औद्योगिक गतिविधियों वाले देवास शहर के लिए यह क्षेत्र अब संभावित ग्रीन लंग्स के रूप में विकसित हो रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययन ने दर्ज किया बदलाव
शंकरगढ़ की वीरानी से हरियाली तक की यात्रा अब वैज्ञानिक जगत में भी पहचान बना रही है। जुलाई 2026 के अंक में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘इंडियन फारेस्टर’ में पोस्ट माइनिंग इकोलाजिकल रीस्टोरेशन इन शंकरगढ़ हिल्स विषय पर अध्ययन प्रकाशित हुआ है।
इसमें उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से खनन के बाद पहाड़ी के पारिस्थितिक पुनर्वास और 2017 से 2025 के बीच हुए बदलावों का आकलन किया गया है। राष्ट्रीय पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ ने भी शंकरगढ़ के परिवर्तन को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
2016 में जगी पहल, 2020 के बाद मिली रफ्तार
ग्रीन आर्मी के समरजीत जाधव बताते हैं कि 2016 में दोस्तों के साथ पहाड़ी पर जाते समय खनन से हुई तबाही ने उन्हें विचलित किया। धीरे-धीरे अन्य संस्थाएं जुड़ीं। 2018 में वन विभाग ने पौधारोपण में रुचि दिखाई और तत्कालीन कलेक्टर चंद्रमौली शुक्ला ने एक लाख पौधे लगाने की पहल की।
विभिन्न विभागों को पौधारोपण का दायित्व दिया गया। लेकिन तब भी खनन जारी था। इसके विरुद्ध एनजीटी में याचिका दायर की गई। आदेश के बाद पहाड़ी के पुनर्स्थापन की दिशा में काम तेज हुआ और 2020 के बाद व्यापक स्तर पर पौधारोपण तथा वानिकी गतिविधियों ने गति पकड़ी।
फिर बची पर्यटन परियोजना से
हरियाली लौटने के बाद पहाड़ी को पर्यटन बोर्ड को देने की योजना बनी। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने फिर एनजीटी का दरवाजा खटखटाया। तर्क दिया गया कि जनता और प्रशासन के प्रयास से विकसित यह क्षेत्र देवास जैसे औद्योगिक शहर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद पहाड़ी को पर्यटन परियोजना से अलग कर वानिकी गतिविधियों के लिए संरक्षित किया गया। आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के दौरान प्राथमिकता से विकसित किए गए 75 आदर्श नगर वनों में शंकरगढ़ वन भी एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर उभरा है।
दूसरी पहाड़ियों के लिए बनेगी केस स्टडी
भारतीय वन सेवा के अधिकारी प्रदीप मिश्रा कहते हैं कि शंकरगढ़ अब प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण पुनर्वास की प्रेरक मिसाल है। वैज्ञानिक अध्ययन में इसका दर्ज होना बताता है कि खनन से क्षतिग्रस्त पहाड़ियां भी सामुदायिक भागीदारी, कानूनी हस्तक्षेप और सतत प्रयासों से फिर जीवन पा सकती हैं।
सैटेलाइट ने भी दर्ज की पहाड़ी की वापसी
2017 से 2025 के बीच शंकरगढ़ में हरियाली बढ़ी। सेंटिनेल-2ए के एनडीवीआई विश्लेषण में औसत सूचकांक 0.19 से बढ़कर 0.30 और अधिकतम 0.46 से 0.68 पहुंचा।
33 खदानों से 8 जलस्रोतों तक, ऐसे बदली शंकरगढ़ की तस्वीर
- 82 हेक्टेयर पहाड़ी का कुल क्षेत्रफल
- 450 फीट जमीन से लगभग ऊंचाई
- 33 खदानें 2015 तक संचालित थीं
- 2,000 से अधिक कंटूर ट्रेंच व जल-संरक्षण संरचनाएं आज
- 8 प्राकृतिक जल स्रोत फिर हुए सक्रिय
शंकरगढ़ मॉडल की तीन सीख
- खनन बंद कराना पर्याप्त नहीं – क्षतिग्रस्त भूमि की मरम्मत भी जरूरी।
- पहले मिट्टी-पानी, फिर पौधारोपण – इसी क्रम ने पौधों की सफलता बढ़ाई।
- सरकार के साथ समाज की भागीदारी – स्वयंसेवक, स्कूल, संस्थाएं और विभाग एक साथ आए।
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