जबलपुर के स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आधुनिक मशीनों और स्टाफ की कमी से कैंसर मरीजों को पूर्ण इलाज नहीं मिल पा रहा है…और पढ़ें

HighLights
- तीन साल बाद भी आधुनिक कैंसर उपचार सुविधाएं पूरी तरह शुरू नहीं।
- लीनियर एक्सीलरेटर सहित कई महत्वपूर्ण मशीनें अब तक नहीं मिलीं।
- 180 बेड अस्पताल में रोज 150 से ज्यादा मरीज पहुंचते हैं।
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (एससीआई) को पूरे महाकौशल क्षेत्र के कैंसर मरीजों के लिए आधुनिक और समग्र उपचार केंद्र के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा था।
करोड़ों रुपये की लागत से तैयार यह संस्थान एक ही छत के नीचे कैंसर की जांच, सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया। हालांकि भवन तैयार होने और ओपीडी शुरू होने के वर्षों बाद भी संस्थान संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है।
आधुनिक मशीनों की कमी, विशेषज्ञ उपकरणों की अनुपलब्धता और स्टाफ की कमी के कारण मरीजों को अभी भी अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। ऐसे में कैंसर के गंभीर मरीजों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ रहा है, जबकि सरकार और मेडिकल कॉलेज प्रशासन जल्द सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रहे हैं।
तीन साल बाद भी अधूरी आधुनिक कैंसर इलाज की सुविधा
- नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत स्थापित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (एससीआई) को खुले तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद संस्थान अभी तक पूरी क्षमता के साथ संचालित नहीं हो सका है।
- भवन निर्माण और अन्य मदों पर लगभग 130 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि आधुनिक मशीनों की खरीदी के लिए 84 करोड़ रुपये का अलग बजट भी स्वीकृत हुआ था। इसके बावजूद लीनियर एक्सीलरेटर जैसी अत्याधुनिक रेडिएशन मशीनें अब तक नहीं पहुंच सकी हैं।
मशीनों की कमी से अधूरा इलाज
- एससीआई में फिलहाल ओपीडी, सामान्य उपचार और ब्लड कैंसर से पीड़ित बच्चों के इलाज जैसी सीमित सेवाएं उपलब्ध हैं। लेकिन रेडिएशन थैरेपी, जटिल कैंसर सर्जरी और अन्य उन्नत उपचार सुविधाएं शुरू नहीं हो पाई हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह आवश्यक मशीनों की अनुपलब्धता है।
मरीजों को अब भी पुरानी व्यवस्था का सहारा
करोड़ों रुपये की लागत से तैयार नई इमारत होने के बावजूद अधिकांश गंभीर मरीजों का उपचार अभी भी मेडिकल कॉलेज की पुरानी बिल्डिंग और वार्डों में किया जा रहा है। एससीआई को एकीकृत कैंसर उपचार केंद्र बनाने की योजना फिलहाल अधूरी बनी हुई है।
रोजाना 150 से अधिक मरीज पहुंच रहे
स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की कुल बेड क्षमता 180 है। यहां प्रतिदिन 150 से अधिक मरीज ओपीडी में उपचार के लिए पहुंचते हैं। संस्थान में दो महिला वार्ड, एक पुरुष वार्ड, 10 बेड की बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट तथा 25 बेड का पीडियाट्रिक वार्ड संचालित किया जा रहा है।
स्टाफ की भी बनी हुई है कमी
संस्थान में वर्तमान में केवल नौ चिकित्सक सेवाएं दे रहे हैं, जबकि आवश्यकता लगभग 16 विशेषज्ञ डॉक्टरों की बताई जा रही है। इसी तरह नर्सिंग स्टाफ भी जरूरत से काफी कम है। वर्तमान कर्मचारियों से ही कार्य लिया जा रहा है, जबकि संस्थान को 60 से अधिक नर्सिंग स्टाफ की आवश्यकता है।
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जल्द लीनियर एक्सीलरेटर मिलने का दावा
- एनएससीबी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. नवनीत सक्सेना के अनुसार एससीआई को पूर्ण रूप से संसाधन संपन्न बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
- उन्होंने बताया कि लीनियर एक्सीलरेटर मशीन के लिए 42 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित किया गया है। साथ ही अन्य आवश्यक उपकरण भी चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे भविष्य में कैंसर मरीजों को एक ही छत के नीचे आधुनिक और बेहतर उपचार की सुविधा मिल सकेगी।
