काेर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां याचिकाकर्ता जबलपुर नगर निगम के कार्यालय में आए और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने ल …और पढ़ें

HighLights
- कोर्ट ने निरस्त कर दी नगर निगम की अपील।
- तल्ख टिप्पणी में कहा कि यह ऐसा मामला नहीं।
- याचिकाकर्ता दिहाड़ी मजदूर बन काम करने लगे।
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि जो 38 वर्ष से सेवा दे रहे हैं, वे अवैध-अनियमित नियुक्ति के दायरे में नहीं रखे जा सकते। लिहाजा, नगर निगम, जबलपुर की अपील निरस्त की जाती है।
काेर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां याचिकाकर्ता जबलपुर नगर निगम के कार्यालय में आए और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने लगे।
उनकी नियुक्ति नगर निगम में कार्यरत तत्कालीन सक्षम अधिकारियों द्वारा की गई थी और यह नियुक्ति लगभग 38 वर्षों से जारी है। नगर निगम लगभग लंबे समय से सेवाएं ले रहा है, इस स्तर पर कर्मचारियों का शोषण नहीं किया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम, जबलपुर की ओर से अधिवक्ता जगत सिंह व प्रतिवादी अजय कुमार सहित अन्य की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार पांडे ने पक्ष रखा।
उन्होंने दलील दी कि नगर निगम ने यह अपील हाई कोर्ट की एकलपीठ द्वारा प्रतिवादियों के हक में सुनाए गए राहतकारी आदेश के विरुद्ध दायर की है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में अजय कुमार सहित अन्य की मांग स्वीकार कर ली थी। साथ ही निर्देश दिया था कि 16 मई, 2007 की नीति और 29 सितंबर, 2014 के स्पष्टीकरण के अनुसार 60 दिन के भीतर सेवाओं में नियमित करें।
1986 में दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्ति के बावजूद उनसे अपेक्षाकृत कनिष्ठ नियमित कर दिए गए, किंतु उन्हें पक्षपात का शिकार बनाकर वंचित कर दिया गया।
