अतुल शुक्ला, नईदुनिया, जबलपुर। वेटरनरी विश्वविद्यालय के स्कूल आफ वाइल्डलाइफ जबलपुर में पिछले करीब डेढ़ माह से एक संक्रमित तेंदुआ पिंजरे में बंद है। केनाइन डिस्टेंपर वायरस से संक्रमित पाए जाने के बाद वन विभाग और वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों के सामने अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि तेंदुए को दोबारा जंगल में छोड़ा जाए या फिर उसे स्थायी रूप से किसी रेस्क्यू सेंटर अथवा चिड़ियाघर में रखा जाए।
निगरानी में रखकर किया जा रहा है उपचार
वन विभाग की टीम ने इसे नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा क्षेत्र के जंगलों से घायल अवस्था में रेस्क्यू किया गया था। प्रारंभिक जांच और चिकित्सकीय परीक्षण में इसमें केनाइन डिस्टेंपर संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके बाद से उसे निगरानी में रखकर उपचार किया जा रहा है।
ग्रस्त होेने के बाद इसके वापस आने की आशंका
इलाज के बाद तेंदुआ पूरी तरह से स्वास्थ्य है, लेकिन वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट के मुताबिक इस वायरस से एक बार ग्रस्त होेने के बाद इसके वापस आने की आशंका रहती है। ऐसे में अब वन विभाग का डर है कि यदि इसे एक बार जंगल में छोड़ा जाता है तो यह अन्य वन जीवों को भी वायरस से प्रभावित कर सकता है।
संक्रामक वायरल बीमारी है, जो सामान्यतः कुत्तों में पाई जाती है
इन दिनों कान्हा और बांधवगढ़ में यह वायरस तेजी से फैली है। हाल ही में बाघों की मौत में भी इस वायरस के होने की पुष्टी सामने आई थी। अब जब स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ के विशेषज्ञों के मुताबिक केनाइन डिस्टेंपर एक गंभीर और अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो सामान्यतः कुत्तों में पाई जाती है, लेकिन यह अब बाघ और तेंदुए जैसे वन्यजीवों को भी तेजी से संक्रमित कर सकती है।
कालेज कैम्पस में बन रहती है दहशत
वाइल्ड लाइफ से जुड़े एक्सपर्ट बताते हैं कि तेंदुए की उम्र करीब 9 से 10 साल की है और उपचार के बाद वह अब स्वस्थ है। स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ में इसे पिंजरे में रखा गया है, जहां 24 घंटे इस पर सीसीटीवी के जरिए निगरानी रखी जा रही है। शुरुआत में उपचार के दाैरान तेंदुए ने पिंजरे से भागने का भी प्रयास किया था।
घटना के बाद पूरे कालेज में दहशत
वह मुख्य पिंजरे से निकलकर दूसरे पिंजरे में चला गया था। इस घटना के बाद पूरे कालेज में दहशत थी। अब तक यह डेढ़ माह से यहां रह रहा है तो कालेज कैम्पस में रहने वालों को डर बना हुआ है। हालांकि स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ मैनेजमेंट पूरी सुरक्षा का दावा कर रहा है। जबकि स्कूल के पास ही महिला छात्रावास है, जहां 100 से ज्यादा छात्राएं रहती हैं। तेंदुए के यहां रहने से इनकी सुरक्षा में भी खतरा बढ़ गया है।
निर्णय नहीं ले पा रहा वन विभाग
गाडवारा से इलाज के लिए जबलपुर लाए गए इस तेंदुए को करीब डेढ़ माह से स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ के पिंजरे में रखा गया है। वन विभाग इसके खाने-पीने की व्यवस्था देखता है, लेकिन सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ मैनेजमेंट की है। केनाइन डिस्टेंपर वायरस से ग्रस्त होने के बावजूद वन विभाग अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि तेंदुए का भविष्य क्या होगा।
पिंजरे में रखना वन्यजीव व्यवहार के लिहाज से उचित नहीं
एक ओर उसे लंबे समय तक पिंजरे में रखना वन्यजीव व्यवहार के लिहाज से उचित नहीं माना जा रहा, वहीं दूसरी ओर जंगल में छोड़ने से संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है। इधर प्रदेश के टाइगर रिजर्व में इस बीमारी से ग्रस्त जानवरों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे पार्क प्रबंधन और वन विभाग परेशान है।
अनदेखी या लापरवाही
- वन विभाग के सीसीएफ वाइल्ड लाइफ को तय करना है कि तेंदुए को कहां रखा जाएगा
- स्कूल आफ वाइल्ड लाइफ के पिंजरे में बंद तेंदुए इलाज-भाेजन के बाद फुर्तिला हाे रहा है।
- डेढ़ माह में हजाराें रुपये का मांस खा चुका, दवाईयों में खर्च हो चुके लाखों
- कैम्पस में चार छात्रावास और 50 से ज्यादा मकानों में रहने वाले डरे हैं
- एक बाद पिंजर से भाग चुका है तेंदुए, जिसमें लापरवाही हुई, पर जांच नहीं
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