निजता की दीवार के पीछे नहीं छिप सकता सच, व्यभिचार विवाद में डीएनए जांच को हाई कोर्ट की मंजूरी

HighLights
- कथित विश्वासघात के आरोप साबित करने का अवसर मांग रहा है
- आरोपों की सत्यता हो, तब न्यायालय सत्य की खोज से आंखें नहीं मूंदेगा
- विषम परिस्थिति में डीएनए परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण साधन
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। मध्य प्रदेश सहित देश भर की अदालतें वैवाहिक विवादों में अक्सर बच्चे की वैधता और उसकी गरिमा को सर्वोच्च मानती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया।
फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार
कहा कि जब विवाद का मूल प्रश्न पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार के आरोपों की सत्यता हो, तब न्यायालय सत्य की खोज से आंखें नहीं मूंद सकता। इसी सिद्धांत के आधार पर हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने पति और बच्ची के डीएनए परीक्षण संबंधी फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।
जिम्मेदारियों से बचने के लिए पितृत्व पर सवाल नहीं
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि पति बच्चे के भरण-पोषण अथवा जिम्मेदारियों से बचने के लिए पितृत्व पर सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि वह अपने वैवाहिक संबंधों में कथित विश्वासघात के आरोप को साबित करने का अवसर मांग रहा है। ऐसी स्थिति में डीएनए परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण साधन बन जाता है।
सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देकर डीएनए जांच का विरोध किया
दरअसल, इस मामले में भारतीय सेना में पदस्थ राजधानी भोपाल निवासी पति ने दावा किया कि वह लंबे समय तक ड्यूटी पर रहता था और गर्भधारण की अवधि के दौरान पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं थे। दूसरी ओर पत्नी ने बच्ची की निजता और सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देकर डीएनए जांच का विरोध किया।
तलाक याचिका में लगाए गए आरोपों की सत्यता की जांच करना
हाई कोर्ट ने माना कि यहां उद्देश्य बच्चे को अवैध ठहराना नहीं, बल्कि तलाक याचिका में लगाए गए आरोपों की सत्यता की जांच करना है। पत्नी की अपील निरस्त करते हुए हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि डीएनए नमूना देने से इंकार किया जाता है तो फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रतिकूल अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र होगी।
