डिजिटल डेस्क, भोपाल। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की ग्वालियर स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (DRDE) ने मानव अपशिष्ट के उपचार के लिए हाई-परफॉर्मेंस बायो-डाइजेस्टर विकसित किया है। इसे घरों, कार्यालयों और व्यावसायिक भवनों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह सिस्टम अपशिष्ट को उसी स्थान पर ट्रीट करता है, जहां वह उत्पन्न होता है और बेहतर गुणवत्ता वाला अंतिम अपशिष्ट जल तैयार करता है।
सेप्टिक टैंक की जगह किया जा सकेगा इस्तेमाल
DRDO के बायोप्रोसेस टेक्नोलॉजी डिवीजन के वैज्ञानिक एमके मेघवंशी ने बताया कि नई तकनीक ब्लैकवाटर ट्रीटमेंट के लिए विकसित की गई है। इसे पारंपरिक सेप्टिक टैंक के स्थान पर लगाया जा सकता है।
घरेलू स्तर पर इस्तेमाल होने वाली यूनिट की एक्स-वर्क्स कीमत करीब 80 हजार रुपये रहने की उम्मीद है। अंतिम कीमत यूनिट की क्षमता, इंस्टालेशन की जरूरत और उपयोगकर्ताओं की संख्या के आधार पर अलग हो सकती है।
बैक्टीरिया से होता है अपशिष्ट का विघटन
बायो-डाइजेस्टर में विशेष रूप से विकसित एनेरोबिक बैक्टीरिया का कंसोर्टियम इस्तेमाल किया जाता है। ये सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में मानव अपशिष्ट को विघटित करते हैं। इस प्रक्रिया में अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा पानी और गैस में बदल जाता है।
नई तकनीक में एनेरोबिक ट्रीटमेंट के साथ एरेशन और सेटलिंग जैसी अतिरिक्त प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। इससे अंतिम डिस्चार्ज की गुणवत्ता में सुधार होता है। पारंपरिक सेप्टिक टैंक की तुलना में इसमें स्लज जमा होने और बार-बार डी-स्लजिंग की जरूरत कम होती है।
सीवर कनेक्शन नहीं होने वाले क्षेत्रों में उपयोगी
यह तकनीक उन आवासीय कॉलोनियों, कार्यालयों, संस्थानों और अन्य भवनों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां भूमिगत सीवर नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। अपशिष्ट को बाहर ले जाने या सेप्टिक टैंक में जमा करने के बजाय इसका उपचार निर्माण स्थल पर ही किया जा सकता है।
भोपाल में प्रस्तुत की गई तकनीक
एमके मेघवंशी ने इस तकनीक को इस सप्ताह भोपाल में आयोजित ‘समृद्ध मध्य प्रदेश @ 2047: Role of Central Institutions’ कॉन्क्लेव में प्रस्तुत किया। इसका आयोजन राज्य सरकार के थिंक टैंक अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ गुड गवर्नेंस एंड पॉलिसी एनालिसिस (AIGGPA) ने किया था।
तकनीक का लाइसेंस दिया
DRDO ने इस तकनीक को फरीदाबाद स्थित अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली एक जापानी कंपनी को ट्रांसफर किया है और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए लाइसेंस दिया है। अन्य उद्योगों के साथ भी तकनीक ट्रांसफर को लेकर बातचीत चल रही है। तकनीक की ट्रांसफर-लाइसेंस फीस 96 लाख रुपये तय की गई है। DRDO ने मध्य प्रदेश सरकार से MSME के लिए सहायता तंत्र बनाने की अपील की है, ताकि लाइसेंस लागत में सहायता मिल सके।
सियाचिन से शुरू हुई कहानी
इस तकनीक की शुरुआत DRDO के उस प्रयास से हुई, जिसमें सियाचिन ग्लेशियर में तैनात सैनिकों से पैदा होने वाले मानव अपशिष्ट के प्रबंधन का समाधान तलाशा गया था। बेहद कम तापमान में अपशिष्ट स्वाभाविक रूप से विघटित नहीं होता और बर्फ पिघलने पर बड़े क्षेत्र को प्रदूषित कर सकता है।
बाद में DRDO की ग्वालियर प्रयोगशाला ने अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और भारतीय रेलवे के लिए इस बायो-डाइजेस्टर को अनुकूलित किया। एमके मेघवंशी के अनुसार, अब 70 से अधिक लाइसेंस प्राप्त तकनीकी साझेदार इन प्रणालियों का निर्माण कर रहे हैं।
