नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। अपने औषधीय ज्ञान के लिए कभी वन्य क्षेत्रों में बड़ी पहचान रखने वाले ‘सहरिया’ खुद टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) के जाल में फंस गए हैं। एक अध्ययन में सामने आया है कि प्रदेश की इस विशेष पिछड़ी जनजाति में टीबी संक्रमण की दर राष्ट्रीय औसत से 17 गुना तक अधिक है।
भोपाल का प्रतिष्ठित गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) की मदद से सहरिया बाहुल्य अंचलों में इस पर शोध करने जा रहा है ताकि इस जनजाति को इस जाल से मुक्त कराया जा सके।
राष्ट्रीय औसत से 17 गुना तक अधिक है संक्रमण की दर
जीएमसी में श्वसन व छाती रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डा. लोकेंद्र दवे ने बताया कि सहरिया जनजाति में टीबी संक्रमण की दर प्रत्येक एक लाख पर 1,518 से 3,294 तक पाई गई है। वर्ष 2024 में टीबी संक्रमण का राष्ट्रीय औसत प्रति एक लाख पर महज 187 था। इसका सीधा मतलब यह है कि सहरिया समुदाय में टीबी संक्रमण की दर सामान्य से आठ से 17 गुना तक ज्यादा है।
आईसीएमआर के ही नेशनल इंस्टीट्यूट फार रिसर्च इन ट्राइबल हेल्थ का ही एक अध्ययन बता रहा है कि सामान्य भारतीय आबादी में टीबी के मामलों की दर प्रति एक लाख पर अधिकतम 250 से 300 होती है। वहीं सहरिया बाहुल्य क्षेत्रों में यह आंकड़ा 3,000 तक पहुंच जाता है।
डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक कुपोषण, एक ही कमरे के बिना हवादार घरों में रहना, धूम्रपान व शराब का अत्यधिक सेवन और कुछ आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों से इस जनजाति में टीबी होने का खतरा सामान्य आबादी से बहुत ज्यादा है। जीएमसी और आइसीएमआर की नई शोध परियोजना पांच महीने की होगी। इसमें इस आबादी को खतरे के कारणों और उससे बाहर निकलने की राह की पड़ताल होगी।
डिजिटल एक्स-रे और एडवांस्ड लैब टेस्टिंग से होगी घेराबंदी
बाक्स डिजिटल एक्स-रे और एडवांस्ड लैब टेस्टिंग से होगी घेराबंदी इस शोध परियोजना के तहत चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम हाईटेक उपकरणों के साथ मैदान में उतरेगी। संदिग्ध मरीजों की पहचान के लिए मौके पर ही डिजिटल एक्स-रे स्क्रीनिंग की जाएगी। इसके साथ ही अत्याधुनिक लैब तकनीकों के जरिए बलगम की जांच कर टीबी के बैक्टीरिया का सटीक पता लगाया जाएगा। मरीजों को डाट्स थेरेपी से जोड़ने और उनकी काउंसलिंग के लिए विशेष हेल्थ असिस्टेंस भी प्रदान की जाएगी।
ग्वालियर-चंबल संभाग में बहुतायत आबादी
बाक्स ग्वालियर-चंबल संभाग में बहुतायत आबादी प्रदेश में सहरिया जनजाति की आबादी सात लाख के करीब अनुमानित है। इस जनजाति का बड़ा हिस्सा ग्वालियर-चंबल संभाग खासकर श्योपुर, शिवपुरी, गुना, ग्वालियर, अशोकनगर, मुरैना और दतिया जिलों में बसा हुआ है।
दीर्घकालिक और प्रभावी स्वास्थ्य नीति बनाने में मिलेगी मदद
इनका कहना है इस शोध से जो व्यावहारिक माडल और निष्कर्ष सामने आएंगे, उनके आधार पर हम शासन को एक दीर्घकालिक और प्रभावी स्वास्थ्य नीति बनाने में मदद करेंगे। इससे जनजातीय अंचलों से टीबी को जड़ से खत्म करने में मदद मिलेगी। – डॉ. कविता एन. सिंह, डीन, जीएमसी, भोपाल।
