यह भी कहा-चिकित्सकीय स्तर पर ही निर्णय सुनिश्चित किए जाएं, ताकि पीड़िताओं को राहत के लिए अदालतों का चक्कर न लगाना पड़े।

HighLights
- 17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता 10 सप्ताह की गर्भवती थी
- संवेदनशील मामलों में अनावश्यक देरी का कारण माना
- अनुमति लेने की परिपाटी आखिर क्यों अपनाई जा रही है
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने दुष्कर्म पीड़िता के गर्भसमापन की अनुमति देने के साथ स्वास्थ्य तंत्र को ऐसा आईना दिखाया है, जिसका असर भविष्य के सैकड़ों मामलों पर पड़ सकता है।
निर्धारित परिस्थितियों में चिकित्सकों को निर्णय लेने का अधिकार
कोर्ट ने साफ कहा कि जब एमटीपी एक्ट, 1971 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था में निर्धारित परिस्थितियों में चिकित्सकों को निर्णय लेने का अधिकार देता है, तब हर मामले में जिला न्यायालय या हाई कोर्ट की अनुमति लेने की परिपाटी आखिर क्यों अपनाई जा रही है। अदालत ने इसे संवेदनशील मामलों में अनावश्यक देरी का कारण माना।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भसमापन को संभव बताया
दरअसल, मंडला जिले की 17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता 10 सप्ताह की गर्भवती थी। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भसमापन को संभव बताया, हालांकि पीड़िता की कम उम्र और स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए प्रक्रिया मेडिकल कालेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में कराने की अनुशंसा की।
लिखित सहमति के बाद हाई कोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति दे दी
पीड़िता और उसकी मां की लिखित सहमति के बाद हाई कोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति दे दी। राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता अजय ओझा ने पक्ष रखा।
आपराधिक प्रकरण में साक्ष्य के रूप में संरक्षित किया जाए
अदालत ने निर्देश दिए कि पूरी प्रक्रिया विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम की मौजूदगी में हो, पीड़िता को समुचित चिकित्सा और पोस्ट-आपरेटिव देखभाल मिले तथा भ्रूण का डीएनए नमूना सुरक्षित रखकर आपराधिक प्रकरण में साक्ष्य के रूप में संरक्षित किया जाए।
न्यायालय ने मंडला के सिविल सर्जन से जवाब तलब किया
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सक्षम चिकित्सा अधिकारी स्वयं निर्णय लेने के बजाय जिम्मेदारी अदालतों पर डाल रहे हैं। न्यायालय ने मंडला के सिविल सर्जन से जवाब तलब किया है।
प्रविधानों के अनुरूप चिकित्सकीय स्तर पर ही निर्णय सुनिश्चित किए जाएं
प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य तथा स्वास्थ्य संचालक को निर्देश दिए हैं कि 24 सप्ताह से कम गर्भावस्था वाले मामलों में एमटीपी एक्ट के प्रविधानों के अनुरूप चिकित्सकीय स्तर पर ही निर्णय सुनिश्चित किए जाएं, ताकि पीड़िताओं को राहत के लिए अदालतों का चक्कर न लगाना पड़े और न्यायालयों पर भी अनावश्यक बोझ न बढ़े।
