डिजिटल डेस्क। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में जब 18 हजार फीट की बर्फीली ऊंचाइयों पर देश की अखंडता दांव पर थी, तब ग्वालियर और चंबल अंचल के वीर सपूतों ने अपनी वीरता से इतिहास रच दिया। दुश्मन भले ही सामरिक रूप से ऊंची चोटियों पर बैठा था, लेकिन हमारे जवानों का हौसला उससे भी ऊंचा था। 527 अमर शहीदों के रक्त से सींचे गए इस विजय-पथ पर ग्वालियर-अंचल के इन जांबाजों की कहानियां आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का अलख जगाती हैं। आइए जानें माटी के इन तीन वीरों की अदम्य गाथा…
तोलोलिंग विजय की हुंकार: “साहब ने कहा, आज तोलोलिंग दे दो… और हमने जीत लिया”

एआई से बना चित्र और सोदान सिंह तोमर का फाइल फोटो।
कारगिल युद्ध को 27 साल हो गए लेकिन तोलोलिंग की वह रात आज भी आंखों के सामने ताजा है। दुश्मन ऊंचाई पर था, गोलियां बरस रही थीं और हर कदम मौत से मुकाबला था। तभी हमारे कमांडिंग आफिसर कर्नल एमबी रविंद्रनाथ ने कहा आज मुझे तोलोलिंग दे दो। बस… वही शब्द हमारी ताकत बन गए।
यह कहना है नायक सोदान सिंह तोमर का, जिन्होंने कारगिल युद्ध की उस ऐतिहासिक लड़ाई को शब्दों में पिरोकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया है। उन्होंने अपनी स्मृतियों और सैन्य अनुभवों के आधार पर तोलोलिंग विजय की कहानी तैयार की है, जो आज सैनिकों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है।
हमारे लिए पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं था
सिंह बताते हैं कि वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुश्मन ने कब्जा कर लिया था। तोलोलिंग पर दो प्रयास असफल होने के बाद उनकी बटालियन को यह जिम्मेदारी मिली। कठिन चढ़ाई, बर्फीली हवा और दुश्मन की लगातार फायरिंग के बावजूद जवानों का हौसला नहीं टूटा। वह बताते हैं कि अंतिम हमले से पहले कर्नल रविंद्रनाथ ने जवानों से कहा, तुम मेरे परिवार हो, तुमने हमेशा मुझे गर्व महसूस कराया है। आज मुझे सिर्फ तोलोलिंग चाहिए। यह सुनते ही पूरी टुकड़ी ने एक स्वर में जवाब दिया यस सर। इसके बाद जवान दुश्मन की चौकियों पर टूट पड़े।
जीत मिली, लेकिन कई साथी हमेशा के लिए बिछड़ गए: सिंह कहते हैं कि तोलोलिंग पर तिरंगा तो लहराया लेकिन इसकी कीमत कई वीर साथियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर चुकाई। चार अधिकारी, दो जेसीओ और कई जवान शहीद हुए, जबकि अनेक सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए। यह जीत कारगिल युद्ध का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। (ग्वालियर से जोगेन्द्र सेन)।
शहादत का भावुक वादा: 6 अगस्त को लौटने की चिट्ठी और तिरंगे में सिमटे सूबेदार राणा

एआई से बना चित्र और बिलदानी नरेंद्र सिंह राणा का फाइल फोटो।
मैं छह अगस्त को घर आ रहा हूं… यह वादा सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा ने अपनी आखिरी चिट्ठी में पत्नी से किया था। परिवार ने घर लौटने की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं। बच्चों को पिता के आने का इंतजार था, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। पांच अगस्त 1999 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हो गए। अगले दिन छह अगस्त को वह घर तो लौटे, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए।
कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर ग्वालियर का यह परिवार आज भी उस आखिरी चिट्ठी और उससे जुड़े वादे को याद कर भावुक हो उठता है। तीन मई 1999 को शुरू हुए कारगिल युद्ध का आधिकारिक समापन 26 जुलाई को भारत की विजय के साथ हुआ, लेकिन सीमा पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए थे। पाकिस्तानी सैनिक लगातार हमले कर रहे थे। ऐसे ही एक अभियान के दौरान कुपवाड़ा सेक्टर में सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा ने दुश्मन का डटकर मुकाबला किया और पांच अगस्त 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
बलिदान के एक हफ्ते बाद घर पहुंची आखिरी चिट्ठी
शहीद के बेटे मृगेंद्र सिंह राणा बताते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद पूरा परिवार उनके लौटने का इंतजार कर रहा था। इसी बीच छह अगस्त की सुबह सेना से उनके शहीद होने की सूचना मिली। उसी दिन शाम को उनका पार्थिव शरीर ग्वालियर पहुंचा। सबसे भावुक पल तब आया, जब शहादत के करीब एक सप्ताह बाद उनकी आखिरी चिट्ठी घर पहुंची। उस पत्र में उन्होंने बच्चों के स्कूल में दाखिले, किताबों, यूनिफार्म और घर की गाय का हाल पूछा था। साथ ही लिखा था कि छह अगस्त को घर पहुंच जाऊंगा।
राणा ने 21 साल की उम्र में पहनी थी सेना की वर्दी
12 दिसंबर 1955 को ग्वालियर के मुरार स्थित घोसीपुरा में जन्मे नरेंद्र सिंह राणा बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखते थे। महज 21 वर्ष की आयु में 12 जुलाई 1976 को भारतीय सेना में भर्ती हुए। राष्ट्रीय राइफल्स में रहते हुए उन्होंने राजस्थान, जम्मू-कश्मीर सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा दी और अंत तक अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। (ग्वालियर से अनूप भार्गव)।
ग्रेनेड के जख्मों पर भारी राष्ट्रभक्ति: घायल होकर भी मोर्चे पर डटे रहे सूबेदार हरेंद्र तोमर

एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से चर्चा करते भूतपूर्व सैनिक हरेंद्र सिंह तोमर और कारगिल युद्ध के समय की उनकी फाइल फोटो।
चंबल ने देश की सेनाओं को हजारों सैनिक दिए हैं, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा लिया और दुश्मन को खदेड़कर देश का माना बढ़ाया। ऐसे ही हैं भूतपूर्व सैनिक हरेंद्र सिंह तोमर ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना का सामना किया। घायल होने के बाद भी मोर्चा संभाले रखा।
कारगिल युद्ध में शामिल मुरैना जिले की पोरसा तहसील के सिलावली गांव में जन्मे हरेंद्र सिंह तोमर भारतीय सेना सेंट्रल आर्डिनेंस डिपो दिल्ली में नायक पद पर पदस्थ थे। 15 मई को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध के लिए तैयार रहने की सूचना मिली। इसके बाद 26 मई को दिल्ली से निकले और 27 मई को कारगिल क्षेत्र में तोलोनिंग में पाकिस्तानी सेना को आगे बढ़ने से रोकने तैनात किया गया। तोलोनिंग का पहाड़ी इलाका इतना दुर्गम था, जहां सेना को कई दिन पैदल चलना पड़ा। सात से आठ दिन दोनों ओर से जमकर गोलाबारी चली। पाकिस्तानी सेना पहाड़ की चोटियों पर थी, भारतीय सेना नीचे से भी डंटकर सामना कर रही थी।
हरेंद्र सिंह बताते हैं, कि पाकिस्तानी सेना ने ग्रेनेट दागे तो एक हैंड ग्रेनेड उनके साथियों के बीच आकर गिरा। इसमें तीन साथी बलिदान हो गए। हरेंद्र सिंह भी बुरी तरह घायल हो गए, फिर भी उन्होंने साथियों के साथ पाकिस्तान सेना का जमकर सामना किया और नीचे से पैदल आ रहे जवानों को कोई नुकसान नहीं होने दिया, इस दौरान उनकी पूरी टुकड़ी ने अदम्य साहस का परिचय दिया, जिसके आगे पाकिस्तान सेना को पीछे हटना पड़ा। हरेंद्र सिंह बताते हैं कि घायल हालत में उन्हें दिल्ली रेफर किया गया, जहां उनका कई दिन इलाज चला। अस्पताल में ही उन्होंने कारगिल युद्ध जीतने की खबर सुनी तो वह अपना सारा दर्द, जख्म भूलकर खुशी में झूमने लगे और पूरा अस्पताल भारत माता के जयकारों से गूंज उठा।
85 दिन चला कारगिल युद्ध, भारत की सेना का लोहा दुनिया ने माना
3 मई 1999 को पाकिस्तान की सेना जम्मू-काश्मीर के तीन हिस्से कारगिल, द्रास और बटालिक में घुस आई। तीनों जगहों पर युद्ध हुआ जो 85 दिन चला। यानी 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान की सेना हार मानते हुए उल्टे पांव भागी। इस युद्ध में भारत के 527 जवान बलिदान हुए और 1363 घायल हुए थे। दुश्मन सेना ऊंचाई से हमले कर रही थी, फिर भी भारत की सेना ने न सिर्फ उन्हें खदेड़ा बल्कि, बुरी तरह हराया। कारगिल युद्ध के बाद भारतीय सेना के पराक्रम को पूरी दुनिया ने माना।
सेवानिवृत्त होकर जीएसटी अफसर बने
कारगिल में पराक्रम के लिए भारतीय सेना ने हरेंद्र सिंह तोमर को आउटटर्न प्रमोशन से नवाजा और नायक पद से पदोन्नत कर सीधे सूबेदार बनाए गए। कई साल तक सूबेदार पद पर सेवा देने के बाद हरेंद्र सिंह सेवानिवृत्त हुए और साल 2013 में एमपीपीएससी परीक्षा पास करने के बाद जीएसटी इंस्पेक्टर बने। हरेंद्र सिंह बताते हैं, कि बचपन से उन्होंने फौजी बनने का सपना देखा। स्काउट गाइड से जुड़े और बेहतर कार्य के लिए 1986 में राज्यपाल व 1987 में राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किए गए। (मुरैना से हरिओम गौड़)।
