बाजार में मंदी, आर्डर की कमी या अन्य कारणों से उद्योग में उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाए और बिजली की वास्तविक खपत शून्य रहे, तब भी बिजली बिल का बोझ खत्म …और पढ़ें

HighLights
- 100 kVA कनेक्शन पर खपत शून्य, फिर भी ₹77 हजार का बिल
- गुजरात और महाराष्ट्र की तर्ज पर एमपी में भी खत्म हो मिनिमम चार्ज
- 500 kVA कनेक्शन पर बिना खपत लग रहा ₹6.88 लाख का चार्ज
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। बाजार में मंदी, आर्डर की कमी या अन्य कारणों से उद्योग में उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाए और बिजली की वास्तविक खपत शून्य रहे, तब भी बिजली बिल का बोझ खत्म नहीं होता। फिक्स्ड/डिमांड चार्ज के साथ लगने वाला न्यूनतम शुल्क (मिनिमम चार्ज) बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बना हुआ है। अगले पांच वर्षों के बिजली टैरिफ निर्धारण से जुड़े प्रारूप में भी इस व्यवस्था को जारी रखने का प्रस्ताव है।
उद्योग संगठनों ने इसका विरोध करने की तैयारी शुरू कर दी है। मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग की ओर से प्रारूप पर 8 सितंबर को जनसुनवाई होगी। संबंधित पक्षों को एक सितंबर तक आपत्ति और सुझाव दर्ज कराने होंगे। औद्योगिक संगठनों की ओर से मिनिमम चार्ज खत्म करने अथवा इसमें बदलाव की मांग उठाई जाएगी।
100 केवीए कनेक्शन पर 77 हजार से अधिक का भार
वर्तमान व्यवस्था में औद्योगिक उपभोक्ताओं से स्वीकृत कनेक्शन क्षमता के आधार पर डिमांड चार्ज लिया जाता है। इसके अलावा न्यूनतम खपत के आधार पर मिनिमम चार्ज भी जुड़ता है। उदाहरण के तौर पर 100 केवीए कनेक्शन वाले उद्योग पर करीब 39,900 रुपये डिमांड चार्ज और 37,500 रुपये मिनिमम चार्ज बनता है।
इस तरह बिजली की खपत शून्य होने पर भी करीब 77,400 रुपये का बिल बन सकता है। 500 केवीए कनेक्शन पर यह राशि करीब 6.88 लाख रुपये तक पहुंचने की स्थिति बताई गई है।
तीन हजार से अधिक एमएसएमई प्रभावित होने का दावा
औद्योगिक संगठनों के अनुसार प्रदेश में बिजली दर और न्यूनतम शुल्क की व्यवस्था से 3,000 से अधिक पंजीकृत एमएसएमई इकाइयां आर्थिक दबाव में हैं। इंदौर-पीथमपुर, भोपाल-मंडीदीप और ग्वालियर-मालनपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में ही 1,200 से अधिक इकाइयों के संकट में होने का दावा किया जा रहा है। उद्योगों का कहना है कि उत्पादन बंद होने पर आय रुक जाती है, लेकिन बिजली कनेक्शन से जुड़े खर्च जारी रहते हैं।
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दूसरे राज्यों का उदाहरण देकर बदलाव की मांग
चेम्बर अध्यक्ष फेडरेशन ऑफ मप्र चेंबरर्स ऑफ कामर्स एडं इडस्ट्रीज के हिमांशु खरे का कहना है कि गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में मिनिमम चार्ज की व्यवस्था समाप्त की जा चुकी है। ऐसे में मध्यप्रदेश में इसे जारी रखने से यहां के उद्योगों की लागत बढ़ रही है और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो रही है। राजेंद्र अग्रवाल सहित औद्योगिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधि आयोग के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराने की तैयारी में हैं। अब सभी की नजर 8 सितंबर की जनसुनवाई पर है।
