भोपाल के बहुचर्चित त्विषा शर्मा की मौत के मामले में हाई कोर्ट जबलपुर ने उसकी सास और पूर्व जज गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत बुधवार की देर रात रद करने क …और पढ़ें

HighLights
- हाईकोर्ट का कड़ा रुख: पूर्व जज गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत देर रात रद
- सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांत: जमानत देने और रद करने के आधार बिल्कुल अलग
- सामाजिक दुष्प्रभाव: जघन्य अपराधों में अनुचित नरमी पर न्यायालय सख्त
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। भोपाल के बहुचर्चित त्विषा शर्मा की मौत के मामले में हाई कोर्ट जबलपुर ने उसकी सास और पूर्व जज गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत बुधवार की देर रात रद करने का आदेश जारी किया। न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने इस निर्णय के पीछे कई दृष्टांत भी बताए। सुप्रीम कोर्ट के विपिन कुमार धीर बनाम पंजाब राज्य और अन्य के मामले को मुख्य आधार बनाया, जिसमें जमानत के सिद्धांत और उसे निरस्त किए जाने का कारण स्पष्ट किया गया है।
जमानत देने और निरस्त करने के अलग-अलग आधार
यह भी कहा गया है कि सर्वविदित कानूनी सिद्धांत को दोहराना उपयोगी होगा कि जमानत निरस्त करने की कार्रवाई जमानत देने की कार्रवाई से भिन्न आधार पर की जानी चाहिए। जमानत निरस्त करने के लिए ठोस और प्रबल कारण मौजूद होने आवश्यक हैं। कोर्ट ने कहा कि दौलत राम बनाम हरियाणा राज्य के मामले में भी आया है कि गैर-जमानती मामले में प्रारंभिक चरण में जमानत की अस्वीकृति और दी गई जमानत को निरस्त करना, अलग-अलग आधारों पर विचार और निपटारा किया जाना चाहिए।
किन परिस्थितियों में वापस ली जा सकती है राहत?
जमानत को निरस्त करने का आदेश देने के लिए अत्यंत ठोस और निर्णायक परिस्थितियां आवश्यक हैं। सामान्यतः, जमानत निरस्त करने के आधार न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना या हस्तक्षेप करने का प्रयास करना, न्याय से बचना या बचने का प्रयास करना, या किसी भी तरह से आरोपित को दी गई रियायत का दुरुपयोग करना हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एक बार दी गई जमानत को यांत्रिक रूप से निरस्त नहीं किया जाना चाहिए, यह विचार किए बिना कि क्या ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं जिनके कारण मुकदमे के दौरान आरोपित को जमानत की रियायत का लाभ उठाकर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने देना निष्पक्ष सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है। इन सिद्धांतों को सुप्रीम कोर्ट के तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने एक्स बनाम तेलंगाना राज्य में दोहराया है।
जब निचली अदालत का आदेश हो जाता है अमान्य
इन निर्णयों में दर्शाई गई चेतावनी के अतिरिक्त, जमानत तब भी निरस्त की जा सकती है जब न्यायालय ने अप्रासंगिक कारकों पर विचार किया हो या रिकॉर्ड पर उपलब्ध प्रासंगिक सामग्री की अनदेखी की हो, जिससे जमानत देने का आदेश कानूनी रूप से अमान्य हो जाता है। अपराध की गंभीरता, आरोपित का आचरण और जांच के प्रारंभिक चरण में कोर्ट द्वारा अनुचित नरमी बरतने का सामाजिक दुष्प्रभाव भी कुछ ऐसी स्थितियां हैं, जहां हाई कोर्ट जमानत के आदेश में हस्तक्षेप कर सकता है।
गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और समाज पर असर
इस संभावना को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए कि आरोपित अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित कर सकता है, मृतक के परिवार के सदस्यों को धमका सकता है, न्याय से भाग सकता है या निष्पक्ष जांच में अन्य बाधाएं उत्पन्न कर सकता है। इस मामले (त्विषा शर्मा की मृत्यु) में आरोपित अपराध जघन्य है और हमारी मध्ययुगीन सामाजिक संरचना को उजागर करता है, जो विधायिका और न्यायपालिका द्वारा किए गए अनेक प्रयासों के बावजूद सुधारों की प्रतीक्षा कर रही है।
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