प्रशांत व्यास, नईदुनिया भोपाल। पुलिस विभाग की कार्यालयीन लापरवाही ने भोपाल के 30 से अधिक पुलिसकर्मियों की पदोन्नति पर ब्रेक लगा दिया। गोपनीय चरित्रावली (एसीआर) की फाइलें पुलिस कमिश्नरेट के विभिन्न कार्यालयों से लेकर पुलिस मुख्यालय तक अलग-अलग स्तर पर दबी रहीं। कहीं फाइलें समय पर आगे नहीं बढ़ाई गईं तो कहीं मुख्यालय पहुंचने के बाद भी संबंधित अधिकारियों तक नहीं पहुंच सकीं।
इसका सीधा असर विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया पर पड़ा और आरक्षक, प्रधान आरक्षक, एएसआई से लेकर पांच थाना प्रभारियों तक को प्रमोशन सूची से बाहर कर दिया गया। पदोन्नति से वंचित हुए पुलिसकर्मियों की कमी उनके कार्य या सेवा रिकॉर्ड में नहीं थी, बल्कि विभागीय प्रक्रिया अधूरी रहने के कारण पांच वर्षों की एसीआर डीपीसी के समक्ष उपलब्ध नहीं हो सकी। आवश्यक अंक पूरे नहीं होने पर उन्हें अपात्र मान लिया गया।
मामला सामने आने के बाद प्रभावित पुलिसकर्मियों ने एडिशनल पुलिस कमिश्नर मोनिका शुक्ला सहित वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की। जांच में सामने आया कि कई एसीआर कमिश्नरेट के कार्यालयों में लंबित थीं, जबकि कुछ फाइलें मुख्यालय पहुंचने के बाद भी संबंधित शाखा तक नहीं पहुंचीं। अब सभी लंबित रिकॉर्ड एकत्र कर पुलिस मुख्यालय भेजे जा रहे हैं, जिसके बाद डीपीसी की रिव्यू बैठक में इन मामलों पर दोबारा विचार होगा।
ऐसे अटक गई पूरी प्रक्रिया
पुलिस विभाग में हर वर्ष आरक्षक और प्रधान आरक्षक की वार्षिक टीप व एएसआई की गोपनीय चरित्रावली संबंधित थाना प्रभारी तैयार करते हैं। इसके बाद एसीपी और डीसीपी के अनुमोदन के बाद फाइल कमिश्नरेट मुख्यालय भेजी जाती है। वहां से पुलिस मुख्यालय में रिकॉर्ड दर्ज होने के बाद विभागीय पदोन्नति समिति पांच वर्षों की एसीआर और वार्षिक टीप के आधार पर पदोन्नति के अंक तय करती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर चूक हुई। कुछ एसीआर डीसीपी कार्यालयों से आगे नहीं बढ़ीं, जबकि कुछ फाइलें पुलिस मुख्यालय पहुंचने के बाद भी संबंधित अधिकारियों तक नहीं पहुंच सकीं। परिणामस्वरूप डीपीसी के समय रिकॉर्ड अधूरा मिला और पात्र पुलिसकर्मी भी प्रमोशन से वंचित रह गए।
पांच थाना प्रभारियों की पदोन्नति भी अटकी
कार्यालयीन लापरवाही केवल आरक्षक, प्रधान आरक्षक और एएसआई तक सीमित नहीं रही। भोपाल के पांच थाना प्रभारी पल्लवी पांडे, निरूपा पांडे, महेश लिल्हारे, सरस्वती तिवारी और हरिकिशन की एसीआर भी समय पर डीपीसी के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बन सकी। कहीं फाइल समय पर भेजी नहीं गई तो कहीं भेजे जाने के बाद भी संबंधित स्तर पर लंबित रह गई। इसके कारण उनकी पदोन्नति भी प्रभावित हुई।
सवाल पूरी व्यवस्था पर
यह मामला किसी एक कार्यालय की लापरवाही का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में समन्वय की कमी का है। यदि प्रत्येक स्तर पर लंबित एसीआर की नियमित समीक्षा होती और पदोन्नति से पहले सेवा रिकॉर्ड का मिलान किया जाता, तो दर्जनों पुलिसकर्मियों को कार्यालयीन चूक का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों तक फाइलें अलग-अलग कार्यालयों में लंबित रहीं, लेकिन किसी स्तर पर उनकी मॉनिटरिंग क्यों नहीं हुई।
अब रिव्यू डीपीसी से उम्मीद
शिकायत के बाद विभाग ने लंबित एसीआर का सत्यापन और रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि सभी लंबित एसीआर उपलब्ध होने के बाद विभागीय पदोन्नति समिति की रिव्यू बैठक होगी। यदि रिकॉर्ड सही पाया गया तो प्रभावित पुलिसकर्मियों को पदोन्नति का लाभ दिया जाएगा।
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सभी पुलिसकर्मियों की गोपनीय चरित्रावली (एसीआर) निर्धारित समय-सीमा में संबंधित कार्यालयों तक पहुंचना अनिवार्य है। यदि किसी स्तर पर एसीआर की फाइलें लंबित रहने के कारण किसी पुलिसकर्मी की पदोन्नति प्रभावित हुई है, तो पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। – संजय कुमार, पुलिस कमिश्नर, भोपाल
