जबलपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि जमानत पर फैसला करते समय केवल एफआईआर या आरोपपत्र ही नहीं, बल्कि ट्रायल के दौरान सामने आए नए तथ्यों को…और पढ़ें

HighLights
- MP हाईकोर्ट ने दी महत्वपूर्ण व्याख्या
- पीड़िता के बयान पर मिला लाभ
- आरोपित को नियमित जमानत मिली
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने जमानत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि जमानत अर्जी पर निर्णय केवल एफआईआर या आरोपपत्र के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि ट्रायल के दौरान ऐसे नए तथ्य सामने आते हैं, जो मामले की परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं, तो उन्हें भी जमानत पर विचार का आधार बनाया जा सकता है।
जज अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ का आदेश
न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ ने बैतूल जिले के गंज थाना क्षेत्र में दर्ज दुष्कर्म, पॉक्सो और एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मुकदमे के दौरान सामने आई बदली हुई परिस्थितियां जमानत के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
पीड़िता के बयान को माना बदली हुई परिस्थिति
अभियोजन के अनुसार आरोपित और युवती के बीच शारीरिक संबंधों के दौरान वह गर्भवती हुई थी और बाद में उसका गर्भपात हो गया। हालांकि ट्रायल कोर्ट में गवाही देते समय बालिग पीड़िता ने कहा कि आरोपित के साथ उसके शारीरिक संबंध उसकी इच्छा और सहमति से बने थे।
हाई कोर्ट ने इस बयान को पहली जमानत अर्जी खारिज होने के बाद उत्पन्न हुई बदली हुई परिस्थिति माना और आरोपित को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके तथा एक सक्षम जमानतदार पर नियमित जमानत देने का आदेश दिया।
डीएनए रिपोर्ट का भी हुआ उल्लेख
आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपित पीड़िता का बायोलॉजिकल पिता है। पेट दर्द होने पर युवती अस्पताल पहुंची थी, जहां वॉशरूम में उसका गर्भपात हो गया। डीएनए रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि होने का उल्लेख किया गया है।
