हाई कोर्ट में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े करीब 100 मामलों पर शुक्रवार को भी सुनवाई हुई। अब मामले की नियमित सुनवाई 20 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे स…और पढ़ें

HighLights
- एमपी में 27% OBC आरक्षण पर हाई कोर्ट में बड़ी बहस
- नियमित रूप से 20 जुलाई को फिर होगी अगली सुनवाई
- वकीलों के विरोध के बाद दोबारा शुरू हुआ टेलीकास्ट
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े करीब 100 मामलों पर शुक्रवार को भी सुनवाई हुई। अब मामले की नियमित सुनवाई 20 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे से होगी। सुनवाई के दौरान यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीमिंग पिछले दो दिनों से बंद रहने पर ओबीसी पक्ष के अधिवक्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद कोर्ट ने गुरुवार की कार्यवाही का सीधा प्रसारण फिर शुरू करा दिया।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें
सुनवाई में सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ताओं और यूथ फॉर इक्वेलिटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी और गोपाल शंकर नारायण ने अपनी दलीलें पूरी कीं। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती की बहस सोमवार को जारी रहेगी।
महाजन आयोग की रिपोर्ट और वैधानिक कसौटी पर बहस
बहस के दौरान 1983 के महाजन आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि आयोग ने ओबीसी के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण की अनुशंसा की थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2019 में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से पहले राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 338-बी के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से राय नहीं ली, इसलिए संशोधन कानून वैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
एकलपीठ के आदेश और सुप्रीम कोर्ट में लंबित एसएलपी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि 2014 में एकलपीठ द्वारा याचिका निरस्त किए जाने के बाद राज्य सरकार ने उस आदेश के विरुद्ध अपील क्यों नहीं की। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बताया कि इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी पहले से लंबित है।
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इंद्रा साहनी मामले का हवाला और कोर्ट के सवाल
याचिकाकर्ताओं ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से पहले आवश्यक अध्ययन नहीं किया गया। वहीं कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने मंडल आयोग के आधार पर ओबीसी आरक्षण को मान्यता दी है तो मध्य प्रदेश में इसे लागू करने में क्या बाधा रही। याचिकाकर्ताओं का जवाब था कि 50 प्रतिशत की सीमा तथा बदलती परिस्थितियों का समुचित परीक्षण किए बिना कानून बनाया गया।
