राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए 18 जून को प्रस्तावित चुनाव में प्रत्याशी चयन भाजपा के लिए अलग तरह की चुनौती बन रहा है। दरअसल, प्रदेश के कोटे की कुल 11 सीटों में से भाजपा के पास आठ हैं, पर इनमें सामान्य वर्ग (सवर्ण) का प्रतिनिधित्व शून्य है।
कांग्रेस के पास तीन सीटें हैं, जिनमें सवर्ण वर्ग से आने वाले दिग्विजय सिंह का कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है, अब केवल विवेक तन्खा ही सवर्ण प्रतिनिधि बचेंगे। उधर, भाजपा स्थानीय बनाम बाहरी का दबाव भी झेल रही है। नेताओं का मानना है कि दोनों सुनिश्चित जीत वाली सीटों पर स्थानीय प्रत्याशियों को प्राथमिकता दी जाए।
एससी-एसटी और ओबीसी का दबदबा
भाजपा के एसटी वर्ग से आने वाले सुमेर सिंह सोलंकी और जार्ज कुरियन (ईसाई) का राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। पार्टी सवर्ण चेहरे को उतारना चाहती है, लेकिन जमीनी स्तर पर मजबूत ओबीसी और आदिवासी लाबी के दबाव के कारण पार्टी असमंजस में है। सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका न दिए जाने का यह तर्क दिया जा सकता है कि उनके गृह जिले बड़वानी से ही एसटी वर्ग के अंतरसिंह आर्य राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति मोर्चा के महामंत्री गजेंद्र पटेल भी खरगोन लोकसभा सीट से सांसद हैं। धार से सांसद सावित्री ठाकुर और बैतूल से सांसद दुर्गादास उइके एसटी वर्ग से ही आते हैं और केंद्रीय मंत्री भी हैं।
ओबीसी वर्ग से कविता पाटीदार, बंशीलाल गुर्जर, माया नारोलिया राज्यसभा सदस्य हैं। एससी वर्ग से सुमित्रा वाल्मीकि, बालयोगी उमेश नाथ जी महाराज और एल. मुरूगन राज्यसभा सदस्य हैं। राज्यसभा सदस्यों में तीन महिलाएं भी हैं। जार्ज कुरियन केंद्रीय मंत्री हैं इसलिए उन्हें मौका न देना भी कठिन है। ऐसे में सवर्ण प्रत्याशी के लिए जगह ढूंढना पार्टी के लिए चुनौती बन रहा है।
नितिन नवीन की टीम में मिल सकती है बड़ी जगह
मध्य प्रदेश से आदिवासी नेतृत्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में दिखाई दे सकता है। साथ ही, देशभर के एसटी मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए नितिन नवीन की टीम में युवा और अनुभवी आदिवासी चेहरों को राष्ट्रीय महासचिव, उपाध्यक्ष या राष्ट्रीय मोर्चा अध्यक्ष जैसी बड़ी जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।
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सवर्णों की अनदेखी का नैरेटिव
अभी राज्यसभा में मध्य प्रदेश से एससी-एसटी और ओबीसी का दबदबा है। इससे सवर्ण वर्ग में यह संदेश जा रहा है कि पार्टी केवल सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर पिछड़े और वंचित वर्गों को ही उच्च सदन में भेज रही है। भाजपा में लंबे समय से सवर्णों की अनदेखी का नैरेटिव सा सेट हो गया है।
भाजपा का मुख्य और पारंपरिक कोर वोटर सवर्ण समाज रहा है, इसलिए इस वर्ग को साधे रखना पार्टी के लिए जरूरी है। भाजपा की प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में सवर्ण वर्ग के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने पर मंथन हुआ है।
