सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। बरगी डेम की अथाह जलराशि इन दिनों केवल लहरों को ही नहीं, बल्कि अनेक अनुत्तरित प्रश्नों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। उस भयावह शाम का शोर अब थम चुका है, लेकिन हादसे की गूंज अभी भी न्याय के गलियारों में सुनाई दे रही है।
जल में डूबा क्रूज भले अब अस्तित्व के नाम पर महज कबाड़ में परिवर्तित हो गया हो, पर उससे जुड़े सवाल लगातार सिर उठाकर पूछ रहे हैं-आखिर सच कहां है? कभी पर्यटन और मनोरंजन का प्रतीक रहा वह क्रूज अब एक ऐसे रहस्य का केंद्र बन चुका है।
इसकी तह तक पहुंचने के लिए गठित हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी की अध्यक्षता वाले एकल न्यायिक जांच आयोग के समक्ष जबलपुर निवासी अखिलेश त्रिपाठी द्वारा अधिवक्ता पंकज दुबे के माध्मय से दायर जनहित याचिका ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न रख दिए हैं। प्रश्न केवल एक दुर्घटना के नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था के भी हैं, जिसके भरोसे लोगों ने अपनी सुरक्षा सौंप रखी थी।
साक्ष्य जब स्वयं मलबे में बदल जाएं, तब सत्य किस आधार पर खड़ा होगा
सबसे बड़ा सवाल इंजन को लेकर है। यदि राष्ट्रीय हरित अधिकरण, एनजीटी ने प्रत्येक क्रूज में फोर-स्ट्रोक इंजन को अनिवार्य माना था, तो फिर बरगी की लहरों पर टू-स्ट्रोक इंजन वाला क्रूज किस अनुमति और किस विश्वास के सहारे दौड़ रहा था? और यदि वास्तव में ऐसा था, तो अब इसकी पुष्टि कैसे होगी, जबकि दुर्घटना के बाद क्रूज और इंजन दोनों को ही तोड़ दिया गया है? साक्ष्य जब स्वयं मलबे में बदल जाएं, तब सत्य किस आधार पर खड़ा होगा?
प्रश्न केवल तकनीकी नहीं हैं, वे व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही की परीक्षा भी
न्यायिक जांच आयोग के समक्ष उठे प्रश्न केवल तकनीकी नहीं हैं, वे व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही की परीक्षा भी हैं। क्रूज का विधिवत पंजीयन हुआ था या नहीं? उसे फिटनेस प्रमाणपत्र प्राप्त था या नहीं? क्या सभी सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था? ये वे प्रश्न हैं जिनके उत्तर केवल दस्तावेजों में नहीं, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व में छिपे हैं।
नेपथ्य में ऐसी कौन सी जल्दबाजी थी, जो अब स्वयं प्रश्नों के घेरे में
सबसे गंभीर प्रश्न तो उस निर्णय को लेकर है, जिसके तहत दुर्घटनाग्रस्त क्रूज को तोड़ दिया गया। आखिर वह कौन-सी विधिक राय थी, जिसने मुख्य साक्ष्य को हटाने का मार्ग प्रशस्त किया? किसी भी दुर्घटना की जांच में घटनास्थल और उससे जुड़े उपकरण सत्य के प्रथम साक्षी होते हैं। यदि वही साक्षी मौन कर दिए जाएं, तो न्याय का मार्ग और अधिक कठिन हो जाता है।
जनहित याचिकाकर्ताओं की चिंता भी यही है। उनका कहना है कि जब राज्य शासन ने पहले ही दिन उच्च स्तरीय जांच की घोषणा कर दी थी, तब इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई गई? क्या यह केवल प्रशासनिक निर्णय था, या फिर उसके पीछे कोई ऐसी जल्दबाजी थी, जो अब स्वयं प्रश्नों के घेरे में है? इसी बीच एक और तथ्य सामने आया है। प्रत्यक्षदर्शी जबलपुर निवासी राजेंद्र निगम द्वारा की गई पड़ताल में संकेत मिला है कि क्रूज के बीमा का कोई स्पष्ट रिकार्ड नहीं है। यदि यह तथ्य सत्य सिद्ध होता है, तो यह जांच की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ देगा।
क्रूज केवल एक दुर्घटना नहीं, न्याय की प्रतीक्षा करता एक मौन प्रश्न बना
बरगी की शांत जलराशि आज भी वैसी ही दिखती है जैसी हादसे से पहले थी। सूर्य अब भी वहीं डूबता है, हवाएं अब भी वहीं बहती हैं, लेकिन उस पानी के नीचे एक ऐसा सच दफ्न है, जिसे बाहर लाना जरूरी है। क्योंकि दुर्घटनाएं केवल जीवन नहीं छीनतीं, वे व्यवस्था से जवाब भी मांगती हैं। जब तक उन सवालों के उत्तर नहीं मिलते, तब तक बरगी डेम में डूबा हुआ क्रूज केवल एक दुर्घटना नहीं रहेगा-वह न्याय की प्रतीक्षा करता एक मौन प्रश्न बना रहेगा।
हमारा मुख्य प्रश्न यही है कि जब राज्य शासन ने पहले ही दिन इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की घोषणा कर दी थी, तो फिर इस तथ्य के प्रकाश में आने के बावजूद हड़बड़ी में क्रूज क्यों तोड़ दिया गया। इस सिलसिले में एमपी टूरिज्य या अन्य संबंंधित विभागों के अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि जो प्रश्नगत है, यानि क्रूज, जब वहीं तोड़ दिया गया, तो फिर जांच, चाहे वह न्यायिक हो या तकनीकी आखिर कैसे सही दिशा में गतिमान होगी।
-अधिवक्ता पंकज दुबे, जनहित याचिकाकर्ता अखिलेश त्रिपाठी के वकील
