सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। इस दुनिया को अलविदा कह गए पद्मश्री से सम्मानित मशहूर शायर बशीर बद्र का जबलपुर शहर से बेहद गहरा और आत्मीय नाता था। उनका विवाह जबलपुर की डा. राहत बद्र से हुआ था, जो खुद एक जानी-मानी साहित्यकार और शिक्षाविद के रूप में चर्चित हुई।
विवाह के बाद से ही बशीर बद्र का इस शहर से ससुराल और साहित्यिक स्तर पर एक अटूट रिश्ता जुड़ गया। यही वजह रही कि उनकी प्रारंभिक गजलों की पहली किताब उजाले अपनी यादों के सर्वप्रथम जबलपुर के विनीत पाठक और आनंद मनोध्या सहित अन्य मुरीद मित्रों की मंडली ने अथक प्रयास से प्रकाशित की थी।

हालांकि कालान्तर में नामवर प्रकाशन के साथ किताब देश दुनिया में छा गई। उनके शेर इतने लोकप्रिय हुए कि ट्रकों के पीछे लिखे जाने लगे। वे लोककवि की मानिंद प्रिय हो गए। जबलपुर में आयोजित होने वाले मुशायरों और कवि सम्मेलनों में बशीर बद्र की उपस्थिति एक विशेष आकर्षण हुआ करती थी।
यहां के साहित्यकारों और काव्य-प्रेमियों के साथ उनका सीधा संवाद था। उनकी पत्नी, राहत बद्र हमेशा उनके साहित्यिक सफर और व्यक्तिगत जीवन की सबसे बड़ी ताकत रहीं।
अपनी रचनात्मकता और गजल की सादगी के लिए मशहूर बशीर बद्र ने जबलपुर की फिजाओं और यहां की तहजीब का अपनी कई रचनाओं में जिक्र किया।
बाद के वर्षों में जब बशीर बद्र अपने गृह नगर मेरठ से भोपाल आकर बस गए, तो भी जबलपुर से उनका पारिवारिक और भावनात्मक जुड़ाव लगातार बना रहा।
नया मोहल्ला निवासी कमरूल इस्लाम खान के पिता सिकंदर हयात खान, जो खुद बड़े शायर थे, उनके साथ सोहबत के चर्चे रहे। उनका शेर हालत के हाथों हम ऐसे खिलौने हैं, जो टूट भी जाएं तो आवाज़ नहीं करते, बशीर को बेहद पसंद था।
