मोहन कुमार, नईदुनिया, नई दिल्ली। किसी भी राज्य की तरक्की का पैमाना वहां की ऊंची इमारतें, एक्सप्रेस-वे या औद्योगिक निवेश के साथ-साथ, उस राज्य में रहने वाली महिलाएं और बच्चे कितने सुरक्षित हैं, इससे भी तय होता है। मध्य प्रदेश जिसे अपनी भौगोलिक स्थिति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण ‘देश का दिल’ कहा जाता है, मौजूदा समय में एक गंभीर सामाजिक संकट से जूझ रहा है। कानून-व्यवस्था के तमाम दावों और महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी योजनाओं के साथ ही एक कड़वी हकीकत यह भी है कि राज्य में महिलाएं और मासूम बच्चे लगातार अपराध का शिकार हो रहे हैं।
यह रिपोर्ट मध्य प्रदेश में महिला एवं बाल अपराधों की वर्तमान स्थिति, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) व राज्य पुलिस के आंकड़ों, अपराधों के पीछे के सामाजिक-प्रशासनिक कारणों और इसके संभावित समाधानों पर आधारित है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़े (साल 2024) और राज्य पुलिस के दस्तावेज एक ऐसी हकीकत बयां करते हैं, जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में शुमार है। कुछ श्रेणियों में अपराधों में कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन महिलाओं, बुजुर्गों और अनुसूचित जनजाति वर्ग के खिलाफ अपराध अब भी गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।
बुजुर्गों के खिलाफ अपराध में MP नंबर वन
बुजुर्गों के खिलाफ अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में शीर्ष पर है। प्रदेश में वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ 5,875 मामले दर्ज किए गए हैं। अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के खिलाफ अपराधों में भी मध्य प्रदेश पहले स्थान पर रहा, जहां आदिवासियों के खिलाफ 3,165 केस दर्ज हुए।

अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराधों में दूसरे नंबर पर
अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के खिलाफ अपराधों के मामलों में भी प्रदेश दूसरे स्थान पर है। मध्य प्रदेश में 7,765 मामले दर्ज किए गए, जबकि उत्तर प्रदेश 14,642 मामलों के साथ पहले स्थान पर रहा।
दुष्कर्म की घटनाओं में मध्य प्रदेश देश में चौथे स्थान पर है। NCRB आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान में सबसे ज्यादा 4,871 मामले दर्ज हुए, जबकि उत्तर प्रदेश में 3,209 और महाराष्ट्र में 3,091 घटनाएं सामने आईं। मध्य प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 3,061 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए।

भोपाल में अपराध दर दोगुनी
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में साल 2023 की तुलना में 2024 में अपराधों में तीन प्रतिशत की गिरावट आई है। बावजूद इसके, भोपाल की अपराध दर प्रति लाख आबादी पर 801.1 बनी हुई है, जो राष्ट्रीय औसत 418.9 से लगभग दोगुनी है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में मध्य प्रदेश अब भी देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है। प्रदेश में औसतन हर दिन 90 से अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं।

सार्वजनिक परिवहन में असुरक्षित महिलाएं
सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं के साथ यौन शोषण की घटनाएं केरल के बाद सर्वाधिक 65 मध्य प्रदेश में हुई हैं। यह आंकड़े साल 2024 के हैं, जिन्हें एनसीआरबी ने जारी किए हैं। दहेज हत्या के मामले में भी मध्य प्रदेश की स्थिति खराब है। वर्ष 2024 में दहेज हत्या के 450 मामले सामने आए, जो बिहार (1057) के बाद दूसरे नंबर पर है। शेल्टर होम में यौन शोषण की सर्वाधिक घटनाओं में भी मध्य प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है।

इंदौर से आई चौंकाने वाली रिपोर्ट
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, इंदौर में साल 2024 में किशोर अपराध के 173 मामले दर्ज हुए। साल 2022 में यह संख्या 211 थी, जो 2023 में घटकर 141 हुई थी, लेकिन 2024 में फिर बढ़ोतरी दर्ज की गई। देश के 19 महानगरों में इंदौर किशोर अपराध के मामलों में आठवें स्थान पर है।
अपराध करने वालों में एक भी निरक्षर नहीं था
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में पकड़े गए कुल 249 किशोर अपराधियों में एक भी निरक्षर नहीं था। इनमें 96 किशोर प्राथमिक शिक्षा प्राप्त थे, 121 मैट्रिक तक पढ़ चुके थे, 23 उच्च माध्यमिक और नौ किशोर इससे आगे की पढ़ाई कर चुके थे। यह स्थिति राष्ट्रीय औसत से अलग है। ये आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि किशोर अपराध अब केवल गरीबी या अशिक्षा से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। साथ ही परिवार साथ होने के बावजूद संवाद का अभाव दिख रहा है।
देशभर में बच्चों के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी
सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों ने अभिभावकों और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराधों में 10 में से 9 मामलों का संबंध अश्लील कंटेंट को पब्लिश या ट्रांसमिट करने से है। देश में कुल अपराधों में गिरावट के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराधों में 5.8% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,87,702 मामले दर्ज किए गए थे।
अड़चन कहां है?
कानून सख्त होने के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती ‘कनविक्शन रेट’ (दोषसिद्धि की दर) और अदालतों में लंबित पड़े मामलों की है। गवाहों का मुकर जाना, पुलिसिया तफ्तीश में देरी और सामाजिक दबाव के कारण कई अपराधी बेदाग छूट जाते हैं, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं।
क्या हैं समाधान?
मध्य प्रदेश को इस कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए केवल थानों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं होगा। इसके लिए एक त्रिकोणीय व्यवस्था की जरूरत है।
सामाजिक मानसिक बदलाव: बेटों की परवरिश में संवेदनशीलता और बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का हौसला देना होगा।
फास्ट ट्रैक कोर्ट: महिला और बाल अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की गति को दोगुना करना होगा ताकि न्याय में देरी न हो।
सुरक्षित बुनियादी ढांचा: सड़कों पर बेहतर लाइटिंग, सीसीटीवी कैमरों का जाल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
कड़े एक्शन से ही मिलेगा समाधान
जब तक लड़कियां बेखौफ होकर रात के सन्नाटे में भी सड़कों पर कदम नहीं बढ़ा पाएंगी, तब तक विकास के हर आंकड़े अधूरे हैं। मध्य प्रदेश को ‘सशक्त और सुरक्षित’ बनाने की शुरुआत आंकड़ों को छिपाने से नहीं, बल्कि हर एक शिकायत पर त्वरित और कड़ा एक्शन लेने से होगी। जनता को सुरक्षा का अहसास कराना ही राज्य की सबसे बड़ी प्रगति होगी।
